Stotram
    Shree Hit Chaurasi

    Shree Hit Chaurasi

    श्री हित चौरासी

    Shree Hit Chaurasi is a collection of 84 devotional padas composed by Shree Hit Harivansh Mahaprabhu, founder of the Radhavallabh Sampradaya. Each pada, written in Braj Bhasha, poetically describes the eternal Vrindavan-vihar and rasa-leela of Radha-Krishna, closing with the signature refrain 'Jai Shree Hit Harivansh'. It is sung daily at the Radhavallabh Temple in Vrindavan and is affectionately known among devotees as 'Chaurasi Ji'.

    Benefits

    • 🪷Awakens loving devotion (prema-bhakti) toward Radha-Krishna
    • 🪷Daily recitation steadies the mind in the bhava of Vrindavan's eternal pastimes
    • 🪷The phalashruti describes it as a boat to cross the ocean of worldly existence
    • 🪷Connects the reciter to the devotional lineage of the Radhavallabh Sampradaya
    • 🪷Cultivates rasika sensibility and aesthetic-devotional appreciation through Braj Bhasha poetry

    Chanting Method

    Recite Shree Hit Chaurasi with a calm mind, absorbed in the bhava of Vrindavan. Traditionally all 84 padas are sung together, or a set number is read daily in sequence. Begin with the mangalacharan, proceed pada by pada in order, and close with the phalashruti.

    Best Time

    Early morning and evening, especially during the daily evening arati observed in Vrindavan

    84 Padas — Read

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    Full Text

    Mangalacharan

    निगम अगोचर बात कहा कहौं अतिहि अनौखी।
    उभय मीत की प्रीति-रीति चोखी ते चोखी॥
    वृन्दावन छबि देखि-देखि, हुलसत हुलसावत।
    जल-तरंगवत् गौर-श्याम विलसत विलसावत॥
    ललितादिक निज सहचरी, निरखि निरखि बलि जात नित।
    चौरासी हित पद कहे, चतुरन कौ यह परम वित॥

    Pada 1 — जोई-जोई प्यारौ करै सोई मोहि भावै

    जोई-जोई प्यारौ करै सोई मोहि भावै,
    भावै मोहि जोई सोई-सोई करैं प्यारे।
    मोकों तौ भावती ठौर प्यारे के नैंनन में,
    प्यारौ भयौ चाहै मेरे नैंनन के तारे॥
    मेरे तन मन प्राण हूँ ते प्रीतम प्रिय,
    अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसों हारे।
    जै श्रीहित हरिवंश हंस-हंसिनी साँवल-गौर,
    कहौ कौन करै जल-तरंगनि न्यारे॥

    Pada 2 — प्यारे बोली भामिनी आजु नीकी जामिनी

    प्यारे बोली भामिनी आजु नीकी जामिनी,
    भेंट नवीन मेघ सौं दामिनी॥
    मोंहन रसिक-राइरी माई, तासौं जु मान करै,
    ऐसी कौन कामिनी।
    जै श्रीहित हरिवंश श्रवण सुनत प्यारी,
    राधिकारमण सौं मिली गज-गामिनी॥

    Pada 3 — प्रात समय दोऊ रस लंपट

    प्रात समय दोऊ रस लंपट, सुरत-जुद्ध जय जुत अति फूल।
    श्रम वारिज घनविन्दु वदन पर, भूषण अंगहि अंग विकूल॥
    कछु रह्यौ तिलक सिथिल अलकावलि, वदन कमल मानौं अलि भूल।
    जै श्रीहित हरिवंश मदन-रंग रँगि रहे, नैंन-बैंन कटि सिथिल दुकूल॥

    Pada 4 — आजु तौ जुवति तेरौ, वदन आनन्द भर्यो

    आजु तौ जुवति तेरौ, वदन आनन्द भर्यो, पिय के संगम के सूचत सुख चैंन।
    आलस वलित बोल, सुरंग रँगे कपोल, विथकित अरुण उनींदे दोऊ नैंन॥
    रुचिर तिलक लेश किरत कुसुम केश, सिर सीमंत भूषित मानौं तैं न।
    करुणाकर उदार राखत कछु न सार, दसन-वसन लागत जब दैंन॥
    काहे कौं दुरत भीरु, पलटे प्रीतम चीर, बस किये श्याम सिखै सत मैंन।
    गलित उरसि माल सिथिल किंकिनी जाल, जै श्रीहित हरिवंश लता-गृह सैंन॥

    Pada 5 — आजु प्रभात लता-मंदिर में

    आजु प्रभात लता-मंदिर में, सुख बरसत अति हरषि युगल वर।
    गौर-श्याम अभिराम रंगभरे, लटकि-लटकि पग धरत अवनि पर॥
    कुच-कुमकुम रंजित मालावलि, सुरत नाथ श्रीश्याम धाम धर।
    प्रिया प्रेम के अंक अलंकृत, चित्रित चतुर शिरोमनि निजकर॥
    दम्पति अति अनुराग मुदित कल, गान करत मन हरत परस्पर।
    जै श्रीहित हरिवंश प्रशंस-परायन, गायन अलि सुर देत मधुर तर॥

    Pada 6 — कौन चतुर जुवती प्रिया

    कौन चतुर जुवती प्रिया, जाहि मिलत लाल चोर है रैन।
    दुरवत क्यौंऽव दुरै सुनि प्यारे, रंग में गहिले चैंन में नैन॥
    उर नख-चंद्र विराने, पट अटपटे से बैन।
    जै श्रीहित हरिवंश रसिक राधापति, प्रमथित मैन॥

    Pada 7 — आजु निकुंज मंजु में खेलत

    आजु निकुंज मंजु में खेलत, नवल किशोर नवीन किशोरी।
    अति अनुपम अनुराग परस्पर, सुनि अभूत भूतल पर जोरी॥
    विद्रुम फटिक विविध निर्मित धर, नव कर्पूर पराग न थोरी।
    कोमल किसलय सयन सुपेसल, तापर श्याम निवेसित गोरी।
    मिथुन हास-परिहास परायन, पीक कपोल कमल पर झोरी।
    गौर-श्याम भुज कलह मनोहर, नीवी-बंधन मोचत डोरी॥
    हरि-उर-मुकुर विलोकि अपनपौ, विभ्रम विकल मान-जुत भोरी।
    चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधत, पिय प्रतिबिंब जनाय निहोरी।
    नेति नेति बचनामृत सुनि-सुनि, ललितादिक देखत दुरि चोरी।
    जै श्रीहित हरिवंश करत कर धूनन, प्रणयकोप मालावलि तोरी॥

    Pada 8 — अति ही अरुण तेरे नैंन नलिन री

    अति ही अरुण तेरे नैंन नलिन री।
    आलस जुत इतरात रँगमगे, भये निशि जागर मषिन मलिन री॥
    सिथिल पलक में उठत गोलक गति, बिंधयौ मोहन मृग सकत चलि न री।
    जै श्रीहित हरिवंश हंस कल गामिनि, संभ्रम देत भ्रमरन अलिन री॥

    Pada 9 — बनी श्रीराधा-मोहन की जोरी

    बनी श्रीराधा-मोहन की जोरी।
    इन्द्रनीलमणि श्याम मनोहर, सातकुम्भ तन गोरी॥
    भाल विशाल तिलक हरि कामिनि, चिकुर चंद्र बिच रोरी।
    गज-नायक प्रभु चाल गयंदनि, गति वृषभानु किसोरी॥
    नील निचोल जुवति मोहन पट, पीत अरुण सिर खोरी।
    जै श्रीहित हरिवंश रसिक राधापति, सुरत रंग में बोरी॥

    Pada 10 — आजु नागरी-किशोर भाँवती विचल जोर

    आजु नागरी-किशोर भाँवती विचल जोर, कहा कहौं अंग-अंग परम माधुरी।
    करत केलि कंठ मेलि बाहुदंड गंड-गंड, परस सरस रास-लास मंडली जुरी॥
    श्यामसुन्दरी बिहार, बाँसुरी मृदंग तार, मधुर घोष नूपुरादि किंकिनी चुरी।
    जै श्रीहित हरिवंश देखत आलि, निर्त्तनी सुधंग चाल, वारि फेर देत प्राण देह सौं दुरी॥

    Pada 11 — मंजुल कल कुंज देश, राधा हरि विशद वेश

    मंजुल कल कुंज देश, राधा हरि विशद वेश, राका नभ कुमुद-बंधु शरद जामिनी।
    साँवल दुति कनक अंग, बिहरत मिलि एक संग, नीरद मनौ नील मध्य लसत दामिनी॥
    अरुण पीत नव दुकूल, अनुपम अनुराग मूल, सौरभयुत शीत अनिल मंद गामिनी।
    किसलय दल रचित शैन, बोलत पिय चाटु बैन, मान सहित प्रतिपद प्रतिकूल कामिनी॥
    मोहन मन मथत मार, परसत कुच-नीवि-हार, वेपथयुत नेति-नेति बदत भामिनी।
    जै श्रीहित हरिवंश प्रभु सुकेलि, बहुविध भर भरत झेलि, सौरत रस रूप नदी जगत-पावनी॥

    Pada 12 — चलहि राधिके सुजान, तेरे हित सुख निधान

    चलहि राधिके सुजान, तेरे हित सुख निधान, रास रच्यौ श्याम तट कलिंद-नन्दिनी।
    निर्त्तत युवती समूह, राग-रंग अति कुतूह, बाजत रसमूल मुरलिका अनन्दिनी॥
    वंशीवट निकट जहाँ, परम रमनि भूमि तहाँ, सकल सुखद मलय बहै वायु मन्दिनी।
    जाती ईषद विकास, कानन अतिसय सुवास, राका निशि सरद मास विमल चंदिनी॥
    जै श्रीहित हरिवंश प्रभु निहारि, लोचन भरि घोष-नारि, नख-सिख सौन्दर्य काम-दुख-निकन्दिनी।
    विलसहु भुज ग्रीव मेलि, भामिनी सुख-सिन्धु झेलि, नव निकुंज श्याम केलि, जगत-वन्दिनी॥

    Pada 13 — नन्द के लाल हर्यौ मन मोर

    नन्द के लाल हर्यौ मन मोर।
    हौं अपने मोतिन लर पोवत, काँकर डारि गयौ सखि भोर॥
    बंक विलोकनि चाल छबीली, रसिक शिरोमनि नन्द किशोर।
    कहि कैसें मन रहत श्रवन सुनि, सरस मधुर मुरली की घोर॥
    इंदु गोविन्द वदन के कारन, चितवन कौं भये नैंन चकोर।
    जै श्रीहित हरिवंश रसिक रस जुवती, तू लै मिल सखी प्रान अकोर॥

    Pada 14 — अधर अरुण तेरे कैसे कै दुराऊँ

    अधर अरुण तेरे कैसे कै दुराऊँ।
    रवि ससि शंक भजन कियौ अपवस, अद्भुत रंगन कुसुम बनाऊँ।
    सुभ कौसेय कसिव कौस्तुभमनि, पंकज-सुतन लै अंगनु लुपाऊँ।
    हरषित इन्दु तजत जैसे जलधर, सो भ्रम ढूँढ़ि कहाँ हौं पाऊँ।
    अम्बुन दम्भ कछू नहीं व्यापत, हिमकर तपै ताहि कैसे कै बुझाऊँ।
    जै श्रीहित हरिवंश रसिक नवरंग पिय, भृकुटी भौंह तेरे खंजन लराऊँ॥

    Pada 15 — अपनी बात मोसौं कहि री भामिनी

    अपनी बात मोसौं कहि री भामिनी,
    औंगी मौंगी रहत गरव की माती।
    हौं तोसौं कहत हारी, सुनिरी राधिका प्यारी,
    निशि कौ रंग क्यौं न कहत लजाती॥
    गलित कुसुम बैनी, सुनिरी सारंग-नैंनी,
    छूटी लट अचरा बढ़त अलसाती।
    अधर निरंग रँग रच्यौरी कपोलन,
    जुवति चलत गजगति अरुझाती॥
    रहसि रमी छबीले, रसन वसन ढीले,
    शिथिल कसनि कंचुकी उर राती।
    सखी सौं सुनि श्रवन, वचन मुदित मन,
    जै श्रीहित हरिवंश चली भवन मुसिकाती॥

    Pada 16 — आजु मेरे कहे चलौ मृगनैंनी

    आजु मेरे कहे चलौ मृगनैंनी।
    गावत सरस जुवति मंडल में, पिय सौं मिलैं भलैं पिकबैंनी॥
    परम प्रवीन कोक-विद्या में, अभिनय निपुन लाग गति लैनी।
    रूपरासि सुनि नवल किशोरी, पल-पल घटत चाँदनी रैनी॥
    जै श्रीहित हरिवंश चली अति आतुर, राधारवन सुरत सुख दैनी।
    रहसि रभस आलिंगन चुम्बन, मदन कोटि कुल भई कुचैनी॥

    Pada 17 — आजु देखि ब्रजसुन्दरी मोहन बनी केलि

    आजु देखि ब्रजसुन्दरी मोहन बनी केलि।
    अंस-अंस बाहु दै, किशोर जोर रूप रासि,
    मनौ तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि॥
    नव निकुंज भ्रमर गुंज, मंजु घोष प्रेम पुंज,
    गान करत मोर पिकन अपने सुर सौं मेलि।
    मदन मुदित अंग-अंग, बीच-बीच सुरत रंग,
    पल-पल जै श्रीहित हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि॥

    Pada 18 — सुनि मेरौ वचन छबीली राधा

    सुनि मेरौ वचन छबीली राधा। तैं पायौ रससिंधु अगाधा॥
    तू वृषभानु गोप की बेटी। मोहनलाल रसिक हँसि भेटी॥
    जाहि बिरंचि उमापति नाये। तापै तैं वन-फूल बिनाये॥
    जो रस नेति-नेति श्रुति भाख्यौ। ताकौ तैं अधर सुधारस चाख्यौ॥
    तेरौ रूप कहत नहिं आवै। जै श्रीहित हरिवंश कछुक जस गावै॥

    Pada 19 — खेलत रास रसिक ब्रज-मण्डन

    खेलत रास रसिक ब्रज-मण्डन। जुवतिन अंस दिये भुज दण्डन॥
    सरद विमल नभ चन्द्र विराजै। मधुर-मधुर मुरली कल बाजै॥
    अति राजत घनश्याम तमाला। कंचन-बेलि बनी ब्रजबाला॥
    बाजत ताल मृदंग उपंगा। गान मथत मन कोटि अनंगा॥
    भूषन बहुत विविध रंग सारी। अंग सुधंग दिखावत नारी॥
    बरसत कुसुम मुदित सुरयोषा। सुनियत दिवि दुंदुभि कल घोषा॥
    जै श्रीहित हरिवंश मगन मन श्यामा। राधारवन सकल सुख धामा॥

    Pada 20 — मोहन लाल के रस माती

    मोहन लाल के रस माती।
    बधू गुपत-गोवत कत मोसौं, प्रथम नेह सकुचाती॥
    देख सँभार पीत पट ऊपर, कहाँ चूनरी राती।
    टूटी लर लटकत मोतिन की, नख बिधु अंकित छाती॥
    अधर-बिंब खंडित मषि मंडित, गंड चलत अरुझाती।
    अरुन नैंन घूमत आलस जुत, कुसुम गलित लटपाती॥
    आजु रहसि मोहन सब लूटी, विविध आपुनी थाती।
    जै श्रीहित हरिवंश वचन सुनि भामिनि, भवन चली मुसिकाती॥

    Pada 21 — तेरे नैंन करत दोऊ चारी

    तेरे नैंन करत दोऊ चारी।
    अति कुलकात समात नहीं कहुँ, मिले हैं कुंजबिहारी॥
    बिथुरी माँग कुसुम गिरि-गिरि परै, लटकि रही लट न्यारी।
    उर नख-रेख प्रगट देखियत है, कहा दुरावत प्यारी॥
    परी है पीक सुभग गंडन पर, अधर निरंग सुकुमारी।
    जै श्रीहित हरिवंश रसिकनी भामिनि, आलस अँग-अँग भारी॥

    Pada 22 — नैनन पर वारौं कोटिक खंजन

    नैनन पर वारौं कोटिक खंजन।
    चंचल चपल अरुन अनियारे, अग्रभाग बन्यौ अंजन॥
    रुचिर मनोहर वक्र बिलोकन, सुरत-समर-दल-गंजन।
    जै श्रीहित हरिवंश कहत न बनैं छबि, सुखसमुद्र-मनरंजन॥

    Pada 23 — राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल

    राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल।
    तैं निज भजन कनक तन जोवन, लियौ मनोहर मोल॥
    अधर निरंग अलक लट छूटी, रंजित पीक कपोल।
    तू रस मगन भई नहिं जानत, ऊपर पीत निचोल॥
    कुच युग पर नख-रेख प्रगट मानौं, शंकर सिर ससि-टोल।
    जै श्रीहित हरिवंश कहत कछु भामिनि, अति आलस सौं बोल॥

    Pada 24 — आजु गोपाल रास रस खेलत

    आजु गोपाल रास रस खेलत, पुलिन कल्पतरु तीर री सजनी।
    सरद विमल नभ चन्द्र विराजत, रोचक त्रिविध समीर री सजनी॥
    चंपक बकुल मालती मुकुलित, मत्त मुदित पिक कीर री सजनी॥
    देसी सुधंग राग रंग नीकौ, ब्रज-जुवतिन की भीर री सजनी॥
    मघवा मुदित निसान बजायौ, व्रत छाँड्यौ मुनि धीर री सजनी।
    जै श्रीहित हरिवंश मगन मन श्यामा, हरत मदन घन पीर री सजनी॥

    Pada 25 — आज नौकौ बनी श्रीराधिका नागरी

    आज नौकौ बनी श्रीराधिका नागरी।
    ब्रज-जुवति-जूथ में रूप अरु चतुरई, सील सिंगार गुन सबन तैं आगरी॥
    कमल दक्षिण भुजा, वाम भुज अंस सखि, गावती सरस मिलि मधुर स्वर राग री।
    सकल विद्या विदित, रहसि हरिवंश हित, मिलत नव-कुंज वर श्याम बड़भाग री॥

    Pada 26 — मोहनी मदन गोपाल की बाँसुरी

    मोहनी मदन गोपाल की बाँसुरी।
    माधुरी श्रवन पुट, सुनत सुनि राधिके! करत रतिराज के ताप कौ नासुरी॥
    सरद राका रजनि, विपिन वृन्दा सजनि, अनिल अति मंद सीतल सहित बासु री।
    परम पावन पुलिन, भृंग-सेवित नलिन, कल्पतरु तीर बलवीर कृत रासु री॥
    सकल मंडल भलीं, तुम जु हरि सौं मिलीं, बनी वर बनित उपमा कहौं कासु री।
    तुम जु कंचन तनी, लाल मर्कत मनी, उभय कल हंस जै श्रीहित हरिवंश बलि दासु री॥

    Pada 27 — मधुऋतु वृन्दावन आनंद न थोर

    मधुऋतु वृन्दावन आनंद न थोर।
    राजत नागरी नव कुशल किशोर॥
    जूथिका जुगल रूप मंजरी रसाल।
    विथकित अलि मधु-माधवी गुलाल॥
    चंपक बकुल कुल विविध सरोज।
    केतकी मेदिनी मद मुदित मनोज॥
    रोचक रुचिर बहै त्रिविध समीर।
    मुकुलित नूत नदत पिक-कीर॥
    पावन पुलिन घन मंजुल निकुंज।
    किसलय सैन रचित सुख-पुंज॥
    मंजीर मुरज डफ मुरली मृदंग।
    बाजत उपंग वीणा वर मुख चंग॥
    मृगमद मलयज कुमकुम अबीर।
    बंदन अगरसत सुरंगित चीर॥
    गावत सुन्दरि-हरि सरस धमार।
    पुलकित खग-मृग बहत न वारि॥
    जै श्रीहित हरिवंश हंस हंसिनी समाज।
    ऐसे ही करौ मिलि जुग-जुग राज॥

    Pada 28 — राधे देखि वन की बात

    राधे देखि वन की बात।
    ऋतु बसन्त अनंत मुकुलित, कुसुम अरु फल पात॥
    वेनु धुनि नंदलाल बोली, सुनि व क्यौं अरसात।
    करत कतव विलम्ब भामिनि, वृथा औसर जात॥
    लाल मर्कतमनि छबीलौ, तुम जु कंचन गात।
    बनी श्रीहित हरिवंश जोरी, उभय गुन-गन-मात॥

    Pada 29 — ब्रज नव तरुनि कदम्ब मुकुटमणि, श्यामा आजु बनी

    ब्रज नव तरुनि कदम्ब मुकुटमणि, श्यामा आजु बनी।
    नख-शिख लौं अँग-अँग माधुरी, मोहे श्याम धनी॥
    यौं राजत कवरी गूँथित कच, कनक-कंज-वदनी
    चिकुर चंद्रिकन बीच अर्ध बिधु, मानौं ग्रसित फनी॥
    सौभग रस सिर स्रवत पनारी, पिय सीमन्त ठनी।
    भृकुटि काम-कोदंड नैंन-सर, कज्जल रेख अनी॥
    तरल तिलक ताटंक गंड पर, नासा जलज मनी।
    दसन कुन्द सरसाधर पल्लव, प्रीतम मन समनी॥
    चिबुक मध्य अति चारु सहज सखि, साँवल बिंदुकनी।
    प्रीतम प्रान रतन संपुट कुच, कंचुकि कसिब तनी॥
    भुज-मृनाल बल हरत बलय जुत, परस सरस स्रवनी।
    श्याम सीस तरु मनु मिडवारी, रची रुचिर रवनी॥
    नाभि गंभीर मीन मोहन मन, खेलन कौं हृदनी।
    कृस कटि पृथु नितम्ब किंकिनि व्रत, कदलि-खंभ जघनी॥
    पद अम्बुज जावक जुत भूषन, प्रीतम उर अवनी।
    नव-नव भाय विलोभि भाम इभ, बिहरत वर करिनी॥
    जै श्रीहित हरिवंश प्रसंसत श्यामा, कीरत विशद घनी।
    गावत श्रवनन सुनत सुखाकर, विश्व दुरित दवनी॥

    Pada 30 — देखत नवनिकुंज सुनि सजनी, लागत है अति चारु

    देखत नवनिकुंज सुनि सजनी, लागत है अति चारु।
    माधविका केतकी लता लै, रच्यौ मदन आगारु॥
    सरद मास राका निशि सीतल मंद-सुगन्ध-समीर।
    परिमल लुब्ध मधुव्रत विथकित, नदत कोकिला-कीर॥
    बहुविधि रंग मृदुल किसलय दल, निर्मित पिय सखि सेज।
    भाजन कनक विविध मधुपूरित, धरे धरनि पर हेज॥
    तापर कुसल किशोर-किशोरी, करत हास-परिहास।
    प्रीतम पानि उरज वर परसत, प्रिया दुरावत वास॥
    कामिनि कुटिल भृकुटि अवलोकत, दिन प्रतिपद प्रतिकूल।
    आतुर अति अनुराग विवस हरि, धाइ धरत भुज-मूल॥
    नागर नीबी-बन्धन मोचत, ऐंचत नील निचोल।
    वधू कपट हठ कोप कहत कल, नेति-नेति मधुबोल॥
    परिरम्भन विपरित रति वितरत, सरस सुरत निजुकेलि।
    इन्द्रनील मनिमय तरु मानौं, लसत कनक की बेलि॥
    रतिरन मिथुन ललाट पटल पर, श्रमजल-सीकर संग।
    ललितादिक अंचल झकझोरत, मन अनुराग अभंग॥
    जै श्रीहित हरिवंश यथामति बरनत, कृष्ण-रसामृत-सार।
    श्रवन सुनत प्रापक रति राधा, पद-अम्बुज सुकुमार॥

    Pada 31 — आज अति राजत दम्पति भोर

    आज अति राजत दम्पति भोर।
    सुरत रंग के रस में भीने, नागरि-नवल किशोर॥
    अंसन पर भुज दिये विलोकत, इन्दुबदन विवि ओर।
    करत पान रस मत्त परस्पर, लोचन तृषित चकोर॥
    छूटी लटन लाल मन करष्यौ, ये याके चित चोर।
    परिरम्भन-चुम्बन मिल गावत, सुर मंदर कलघोर॥
    पग डगमगत चलत वन बिहरत, रुचिर कुंज घनखोर।
    जै श्रीहित हरिवंश लाल-ललना मिलि, हियौ सिरावत मोर॥

    Pada 32 — आजु वन क्रीड़त श्यामा-श्याम

    आजु वन क्रीड़त श्यामा-श्याम।
    सुभग बनी निशि शरद चाँदनी, रुचिर कुंज अभिराम॥
    खंडन अधर करत परिरम्भन, ऐंचत जघन दुकूल।
    उर नख-पात तिरीछी चितवन, दंपति रस समतूल॥
    वे भुज पीन पयोधर परसत, वामद्रशा पिय हार।
    बसनन पीक अलक आकर्षत, समर-श्रमित सतमार॥
    पल-पल प्रबल चौंप रस-लम्पट, अति सुन्दर सुकुमार।
    जै श्रीहित हरिवंश आजु तृण टूटत, हौं बलि विशद बिहार॥

    Pada 33 — आजु वन राजत जुगल किशोर

    आजु वन राजत जुगल किशोर।
    नंदनँदन वृषभानु नन्दिनी उठे उनींदे भोर॥
    डगमगात पग परत सिथिल गति, परसत नख-ससि-छोर।
    दसन-वसन खंडित मषि मंडित, गंड तिलक कछु थोर॥
    दुरत न कच-करजन के रोके, अरुन नैंन अलि चोर।
    जै श्रीहित हरिवंश सँभार न तन-मन, सुरत-समुद्र झकोर॥

    Pada 34 — वन की कुंजन-कुंजन डोलन

    वन की कुंजन-कुंजन डोलन।
    निकसत निपट साँकरी बीथिन, परसत नाहिं निचोलन॥
    प्रात काल रजनी सब जागे, सूचत सुख दृग लोलन।
    आलसवन्त अरुन अति व्याकुल, कछु उपजत गति गोलन॥
    निर्त्तन भृकुटि बदन अम्बुज मृदु, सरस हास मधु बोलन।
    अति आसक्त लाल अलि लम्पट, बस कीने बिनु मोलन॥
    बिलुलित सिथिल श्याम छूटी लट, राजत रुचिर कपोलन।
    रति विपरित चुम्बन परिरम्भन, चिबुक चारु टक टोलन॥
    कबहुँ स्रमित किसलय सिज्या पर, मुख अंचल झक झोलन।
    दिन जै श्रीहित हरिवंश दासि हिय सींचत, वारिध केलि कलोलन॥

    Pada 35 — झूलत दोऊ नवल किशोर

    झूलत दोऊ नवल किशोर।
    रजनी-जनित रंग सुख सूचत, अंग-अंग उठि भोर॥
    अति अनुराग भरे मिलि गावत, सुर मंदर कल घोर।
    बीच-बीच प्रीतम चित चोरत, प्रिया नैंन की कोर॥
    अबला अति सुकुमार डरत मन, वर हिंडोर झकोर।
    पुलकि-पुलकि प्रीतम उर लागत, दै नव उरज अँकोर॥
    अरुझी विमल माल कंकन सौं, कुंडल सौं कच डोर।
    वेपथ जुत क्यौं बनैं विवेचत, आनँद बढ्यौ न थोर॥
    निरखि-निरखि फूलत ललितादिक, विवि मुख चन्द्र चकोर।
    दै असीस जै श्रीहित हरिवंश प्रसंसत, करि अंचल की छोर॥

    Pada 36 — आज वन नीकौ रास बनायौ

    आज वन नीकौ रास बनायौ।
    पुलिन पवित्र सुभग यमुना-तट, मोहन बेनु बजायौ॥
    कल कंकन किंकिनि नूपुर धुनि, सुनि खग-मृग सचु पायौ।
    जुवतिनु मण्डल मध्य श्याम घन, सारंग राग जमायौ॥
    ताल मृदंग उपंग मुरज डफ, मिलि रस-सिन्धु बढ़ायौ।
    विविध विसद वृषभानुनन्दिनी, अंग सुधंग दिखायौ॥
    अभिनय-निपुन लटकि लट लोचन, भृकुटि अनंग नचायौ।
    ताताथेई ताथेई धरत नूतन गति, पति ब्रजराज रिझायौ॥
    सकल उदार नृपति चूड़ामणि, सुख-वारिद बरसायौ।
    परिरम्भन चुम्बन आलिंगन, उचित जुवतिजन पायौ॥
    बरसत कुसुम मुदित नभनायक, इन्द्र निसान बजायौ।
    जै श्रीहित हरिवंश रसिक राधापति, जस-वितान जग छायौ॥

    Pada 37 — चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर

    चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर।
    तो बिनु कुँवर कोटि बनिता-जुत, मथन मदन की पीर॥
    गद-गद सुर विरहाकुल पुलकित, स्रवत बिलोचन नीर।
    क्रासि-क्रासि वृषभानु नन्दिनी, बिलपत विपिन अधीर॥
    वंशी विसिख व्याल मालावलि, पंचानन पिक कीर।
    मलयज गरल हुतासन मारुत, साखामृग-रिपु चीर॥
    जै श्रीहित हरिवंश परम कोमल चित, चपल चली पिय तीर।
    सुनि भयभीत बज्र कौ पंजर, सुरत सूर रणधीर॥

    Pada 38 — बेगि चलहि उठि गहर करत कत, निकुंज बुलावत लाल

    बेगि चलहि उठि गहर करत कत, निकुंज बुलावत लाल।
    हा राधा-राधिका पुकारत, निरखि मदन गज ढाल॥
    करत सहाय शरद शशि मारुत, फूटि मिली उर माल।
    दुर्गम तकत समर अति कातर, करहि न पिय प्रतिपाल॥
    जै श्रीहित हरिवंश चली अति आतुर, श्रवन सुनत तेहि काल।
    लै राखे गिरि-कुच बिच सुन्दर, सुरत-सूर ब्रजबाल॥

    Pada 39 — खेल्यौ लाल चाहत रवन

    खेल्यौ लाल चाहत रवन।
    रचि-रचि अपने हाथ सँवायौ, निकुंज भवन॥
    रजनी सरद मंद सौरभ सौं, सीतल पवन।
    तो बिनु कुँवरि काम की वेदन, मेटव कवन॥
    चलहि न चपल बाल-मृगनैंनी, तजिव मवन।
    जै श्रीहित हरिवंश मिलव प्यारे की, आरति-दवन॥

    Pada 40 — बैठे लाल निकुंज भवन

    बैठे लाल निकुंज भवन।
    रजनी रुचिर मल्लिका मुकुलित, त्रिविध पवन॥
    तू सखि काम केलि मनमोहन, मदन दवन।
    वृथा गहर कत करत कृसोदरि, कारन कवन॥
    चपल चली तन की सुध बिसरी, सुनत श्रवन।
    जै श्रीहित हरिवंश मिले रस-लंपट, राधिका रवन॥

    Pada 41 — प्रीति की रीति रँगीलौई जानै

    प्रीति की रीति रँगीलौई जानै।
    जद्यपि सकल लोक चूड़ामणि, दीन अपनपौ मानै॥
    यमुना पुलिन निकुंज भवन में, मान मानिनी ठानै।
    निकट नवीन कोटि कामिनि कुल, धीरज मनहि न आनै॥
    नस्वर नेह चपल मधुकर ज्यौं, आन-आन सौं बानै।
    जै श्रीहित हरिवंश चतुर सोई लालहिं, छाँड़ि मैड़ पहिचानै॥

    Pada 42 — प्रीति न काहू की कानि विचारै

    प्रीति न काहू की कानि विचारै।
    मारग अपमारग विथकित मन, को अनुसरत निवारै॥
    ज्यौं सरिता सावन जल उमगत, सनमुख सिन्धु सिधारै।
    ज्यौं नादहि मन दिये कुरंगन, प्रगट पारधी मारै॥
    जै श्रीहित हरिवंश हिलग सारंग ज्यौं, सलभ सरीरहि जारै।
    नाइक निपुन नवल मोहन बिनु, कौन अपनपौ हारै॥

    Pada 43 — अति नागरि वृषभानु किशोरी

    अति नागरि वृषभानु किशोरी।
    सुन दूतिका चपल मृगनैंनी, आकर्षत चितवत चित गोरी॥
    श्रीफल उरज कंचन-सी देही, कटि केहरि गुण-सिंधु-झकोरी।
    बैंनी भुजंग चन्द्रसत बदनी, कदलि जंघ जलचर गति चोरी॥
    सुनि हरिवंश आज रजनी-मुख, बन मिलाइ मेरी निज जोरी।
    जद्यपि मान समेत भामिनी, सुनि कत रहत भली जिय भोरी॥

    Pada 44 — चलि सुन्दरि बोली वृन्दावन

    चलि सुन्दरि बोली वृन्दावन।
    कामिनि कण्ठ लागि किन राजहि, तू दामिनि मोहन नूतन घन॥
    कंचुकि सुरंग विविध रंग सारी, नख-जुग-ऊन बने तेरे तन।
    ये सब उचित नवल मोहन कौं, श्रीफल कुच जोवन आगम-धन॥
    अतिसय प्रीति हुती अन्तर गति, जै श्रीहित हरिवंश चली मुकुलित मन।
    निविड़ निकुंज मिले रस-सागर, जीते सत रतिराज सुरत रन॥

    Pada 45 — आवत श्रीवृषभानु दुलारी

    आवत श्रीवृषभानु दुलारी।
    रूप-रासि अति चतुर-शिरोमणि अंग-अंग सुकुमारी॥
    प्रथम उबटि मज्जन करि सज्जित, नील-बरन तन सारी।
    गूँथित अलक तिलक कृत सुन्दर, सैंदुर माँग सँवारी॥
    मृगज समान नैंन अंजन जुत, रुचिर रेख अनुसारी।
    जटित लवंग ललित नासा पर, दसनावलि कृत कारी॥
    श्रीफल उरज कसूंभी कंचुकि कसि, ऊपर हार छबि न्यारी।
    कृस कटि उदर गंभीर नाभिपुट, जघन नितम्बन भारी॥
    मनौं मृनाल भूषन भूषित भुज श्याम अंस पर डारी।
    जै श्रीहित हरिवंश जुगल करिनी-गज बिहरत वन पिय-प्यारी॥

    Pada 46 — विपिन घन कुंज रति केलि भुज मेलि रुचि

    विपिन घन कुंज रति केलि भुज मेलि रुचि,
    श्याम-श्यामा मिले शरद की जामिनी।
    हृदै अति फूल सम तूल पिय नागरी,
    करिनि-करि मत्त मनौ विविध गुन रामिनी॥
    सरस गति हास-परिहास आवेस बस,
    दलित दल मदन-बल कोक रस कामिनी।
    जै श्रीहित हरिवंश सुनि लाल लावन्य भिदे,
    प्रिया अति सूर सुख सुरत संग्रामिनी॥

    Pada 47 — बन की लीला लालहिं भावै

    बन की लीला लालहिं भावै।
    पल-प्रसून बीच प्रतिबिंबहिं, नख-सिख प्रिया जनावै॥
    सकुच न सकत प्रगट परिरम्भन, अलि लम्पट दुरि धावै।
    संभ्रम देत कुलक कल कामिनि, रति-रण-कलह मचावै॥
    उलटी सबै समुझि नैंनन में, अंजन रेख बनावै।
    जै श्रीहित हरिवंश प्रीति रीति बस, सजनी श्याम कहावै॥

    Pada 48 — बनी वृषभानु नन्दिनी आजु

    बनी वृषभानु नन्दिनी आजु।
    भूषन-वसन विविध पहिरे तन, पिय मोहन हित साजु॥
    हाव-भाव लावन्य भृकुटि लट, हरत जुवति-जन पाजु।
    ताल भेद औघर सुर सूचत, नूपुर किंकिनि बाजु॥
    नव निकुंज अभिराम श्याम सँग, नीकौ बन्यौ समाजु।
    जै श्रीहित हरिवंश विलास-रास जुत, जोरी अविचल राजु॥

    Pada 49 — देख सखी राधा पिय केलि

    देख सखी राधा पिय केलि।
    ये दोऊ खोरि खिरक गिरि गहवर, बिहरत कुँवर कण्ठ भुज मेलि॥
    ये दोऊ नवलकिशोर रूप निधि, विटप तमाल कनक मनौं बेलि।
    अधर अदन चुम्बन-परिरम्भन, तन पुलकित आनँद रस झेलि॥
    पट-बंधन कंचुकि कुच परसत, कोप कपट निरखत कर पेलि।
    जै श्रीहित हरिवंश लाल रस लम्पट, धाइ धरत उर बीच सकेलि॥

    Pada 50 — नवलनागरि नवलनागर किशोर मिलि

    नवलनागरि नवलनागर किशोर मिलि,
    कुंज कोमल कमल दलन सिज्या रची।
    गौर-साँवल अंग रुचिर तापर मिले,
    सरस मनि नील मनों मृदुल कंचन खची॥
    सुरत नीवी निबन्ध हेतु प्रिय मानिनी,
    प्रिया की भुजनि में कलह मोहन मची।
    सुभग श्रीफल उरज पानि परसत रोष,
    हुँकार गर्व दृग-भंगि भामिनी लची॥
    कोक कोटिक रभस रहसि हरिवंश हित,
    विविध कल माधुरी किमपि नाहिन बची।
    प्रणयमय रसिक ललितादि लोचन चषक,
    पिवत मकरंद सुख-रासि अंतर सची॥

    Pada 51 — दान दै री नवल किशोरी

    दान दै री नवल किशोरी।
    माँगत लाल लाड़िलौ नागर, प्रगट भई दिन-दिन की चोरी॥
    नव नारंग कनक हीरावलि, विद्रुम सरस जलज मनि गोरी।
    पूरित रस पीयूष जुगल घट, कमल कदलि खंजन की जोरी॥
    तोपै सकल सौंज दामन की, कत सतरात कुटिल दृग भोरी।
    नूपुर रव किंकिनि पिसुन घर, जै श्रीहित हरिवंश कहत नहिं थोरी॥

    Pada 52 — देखो माई, सुन्दरता की सींवाँ

    देखो माई, सुन्दरता की सींवाँ।
    ब्रज नव तरुनि कदंब नागरी, निरखि करत अधग्रीवाँ॥
    जो कोऊ कोटि कलप लगि जीवै, रसना कोटिक पावै।
    तऊ रुचिर वदनारविंद की, शोभा कहत न आवै॥
    देव-लोक भू-लोक रसातल, सुनि कवि-कुल मति डरिये।
    सहज माधुरी अंग-अंग की, कहि कासौं पटतरिये॥
    जै श्रीहित हरिवंश प्रताप रूप गुण, वय बल श्याम उजागर।
    जाकी भ्रू-विलास बस पशुरिव, दिन विथकित रस सागर॥

    Pada 53 — देखौ माई अबला कै बल-रासि

    देखौ माई अबला कै बल-रासि।
    अति गज मत्त निरंकुश मोहन, निरखि बँधे लट-पासि॥
    अब ही पंगु भई मन की गति, बिनु उद्यम अनियास।
    तब की कहा कहौं जब पिय प्रति, चाहत भृकुटि विलास॥
    कच संजमन व्याज भुज दरसत मुसिकन वदन विकास।
    हा-हरिवंश अनीत रीत हित, कत डारत तन त्रास॥

    Pada 54 — नयौ नेह नव रंग नयौ रस, नवल श्याम वृषभानु किशोरी

    नयौ नेह नव रंग नयौ रस, नवल श्याम वृषभानु किशोरी।
    नव पीताम्बर नवल चूनरी, नई-नई बूँदन भीजत गोरी॥
    नव वृन्दावन हरित मनोहर, नव चातक बोलत मोर-मोरी।
    नव मुरली जु मलार नई गति, श्रवन सुनत आये घनघोरी॥
    नव भूषन नव मुकुट बिराजत, नई-नई उरप लेत थोरी-थोरी।
    जै श्रीहित हरिवंश असीस देत मुख, चिरजीवौ भूतल यह जोरी॥

    Pada 55 — आजु दोऊ दामिनि मिलि बहसी

    आजु दोऊ दामिनि मिलि बहसी।
    बिच लै श्याम घटा अति नूतन, ताके रंग रसी॥
    एक चमकि चहुँ ओर सखी री, अपने सुभाय लसी।
    आई एक सरस गहनी में, दुहुँ भुज बीच बसी॥
    अम्बुज नील उभय विधु राजत, तिनकी चलन खसी।
    जै श्रीहित हरिवंश लोभ भेंटन मन, पूरन सरद ससी॥

    Pada 56 — हौं बलिजाऊ नागरी श्याम

    हौं बलिजाऊ नागरी श्याम।
    ऐसे ही रंग करौ निशि-वासर, वृन्दाविपिन कुटी अभिराम॥
    हास विलास सुरत रस सींचन, पशुपति-दग्ध जिवावत काम।
    जै श्रीहित हरिवंश लोल लोचन अलि, करहु न सफल सकल सुखधाम॥

    Pada 57 — प्रथम यथामति प्रणऊँ, श्रीवृन्दावन अति रम्य

    प्रथम यथामति प्रणऊँ, श्रीवृन्दावन अति रम्य।
    श्रीराधिका कृपा बिनु, सबके मनन अगम्य॥
    वर यमुनाजल सींचन, दिनहीं सरद-बसंत।
    विविध भाँति सुमनस के, सौरभ अलि-कुल मंत॥
    अरुन नूत पल्लव पर, कूजत कोकिल कीर।
    निर्त्तन करत सिखीकुल, अति आनन्द अधीर॥
    बहत पवन रुचिदायक, शीतल-मंद सुगंधु।
    अरुन-नील-सित मुकुलित, जहाँ तहाँ पूषन-बन्धु॥
    अति कमनीय विराजत, मन्दिर नवल निकुंज।
    सेवत सगन प्रीतिजुत, दिन मीनध्वज-पुंज॥
    रसिक-रासि जहाँ खेलत, श्यामा-श्याम किशोर।
    उभै बाहु परिरंजित, उठे उनींदे भोर॥
    कनक कपिस पट शोभित, सुभग साँवरे अंग।
    नील वसन कामिनि उर, कंचुकी करूभी सुरंग॥
    ताल रबाब मुरज डफ, बाजत मधुर मृदंग।
    सरस उकति-गति सूचत, वर बँसुरी मुख चंग॥
    दोऊ मिलि चाँचर गावत, गौरी राग अलाप।
    मानस-मृग बल बेधत, भृकुटि धनुष दृग चाँप॥
    दोऊ कर तारिनु पटकत, लटकत इत उत जात।
    हो-हो-होरी बोलत, अति आनँद कुलकात॥
    रसिक लाल पर मेलत, कामिनि बंदन धूरि।
    पिय पिचकारिनु छिरकत, तकि-तकि कुमकुम पूरि॥
    कबहुँ-कबहुँ चन्दन तरु, निर्मित तरल हिंडोल।
    चढ़ि दोऊ जन झूलत, फूलत करत कलोल॥
    वर हिंडोल झकोरन, कामिनि अधिक डरात।
    पुलकि-पुलकि वेपथ अँग, प्रीतम उर लपटात॥
    हित चिंतक निज-चेरिनु, उर आनन्द न समात।
    निरखि निपट नैंनन सुख, तृण तोरत बलि जात॥
    अति उदार विधि सुन्दर, सुरत सूर सुकुमार।
    जै श्रीहित हरिवंश करौ दिन, दोऊ अचल बिहार॥

    Pada 58 — तेरे हित लैन आई, वन तें श्याम पठाई

    तेरे हित लैन आई, वन तें श्याम पठाई, हरत कामिनि घन कदन काम कौ।
    काहे कौं करत बाधा, सुन री चतुर राधा, भेटि कैं मेटि री माई प्रगट जगत भौ॥
    देखि री रजनी नीकी, रचना रुचिर पी की, पुलिन नलिन नभ उदित रोहिनी-धौ॥
    तू तौऽव सखी सयानी, तैं मेरी एकौ न मानी, हौं तोसौं कहत हारी जुवति जुगति सौं॥
    मोहन लाल छबीलौ, अपने रंग रँगीलौ, मोहत बिहंग पशु मधुर मुरली रौ।
    ते तौऽव गनत तन जीवन जोवन तव, जै श्रीहित हरिवंश हरि भजहि भामिनि जौ॥

    Pada 59 — यह जु एक मन बहुत ठौर करि

    यह जु एक मन बहुत ठौर करि, कहि कौनें सचु पायौ।
    जहाँ-तहाँ विपति जार-जुवती लौं, प्रगट पिंगला गायौ॥
    द्रै तुरंग पर जोर चढ़त हठ, परत कौन पै धायौ।
    कहि धौं कौन अंक पर राखै, जो गनिका सुत जायौ॥
    जै श्रीहित हरिवंश प्रपंच बंच सब, काल व्याल कौ खायौ।
    यह जिय जानि श्याम-श्यामा पद, कमल-संगी सिर नायौ॥

    Pada 60 — कहा कहौं इन नैंनन की बात

    कहा कहौं इन नैंनन की बात।
    ये अलि प्रिया-वदन-अम्बुज रस, अटके अनत न जात॥
    जब-जब रुकत पलक सम्पुट लट, अति आतुर अकुलात।
    लंपट लव निमेष अन्तर तें, अलप कलप सत सात॥
    श्रुति पर कंज दृगंजन कुच बिच, मृगमद है न समात।
    जै श्रीहित हरिवंश नाभि-सर-जलचर, जाँचत साँवल गात॥

    Pada 61 — आजु सखी वन में जु बने प्रभु

    आजु सखी वन में जु बने प्रभु, नाचत हैं ब्रजमंडन।
    वैस किशोर जुवति अंसन पर, दिये विमल भुज दंडन॥
    कोमल कुटिल अलक सुठि शोभित, अवलम्बित युग गंडन।
    मानहुँ मधुप थकित रस-लम्पट, नील कमल के खंडन॥
    हास-विलास हरत सबकौ मन, काम समूह विहंडन।
    जै श्रीहित हरिवंश करत अपनौं जस, प्रगट अखिल ब्रह्माण्डन॥

    Pada 62 — खेलत रास दुलहिनी दूलहु

    खेलत रास दुलहिनी दूलहु।
    सुनहु न सखी सहित ललितादिक, निरखि-निरखि नैंनन किन फूलहु॥
    अति कल मधुर महा मोहन धुनि, उपजत हंस सुता के कूलहु॥
    थेई-थेई वचन मिथुन मुख निसरत, सुनि-सुनि देह दशा किन भूलहु॥
    मृदु पदन्यास उठत कुंकुम रज, अद्भुत बहत समीर दुकूलहु।
    कबहुँ श्याम श्यामा दसनांचल, कच-कुच हार छुवत भुजमूलहु॥
    अति लावन्य रूप अभिनय गुन, नाहिन कोटि काम समतूलहु।
    भृकुटि विलास हास रस बरसत, जै श्रीहित हरिवंश प्रेम रस झूलहु॥

    Pada 63 — मोहन मदन त्रिभंगी

    मोहन मदन त्रिभंगी। मोहन मुनि-मन-रंगी।
    मोहन मुनि सघन प्रगट परमानन्द, गुन गंभीर गुपाला।
    सीस किरीट श्रवण मणि-कुण्डल, उर मंडित वनमाला॥
    पीताम्बर तन-धातु विचित्रित, कल किंकिनि कटि चंगी।
    नख-मनि तरनि चरन सरसीरुह, मोहन मदन त्रिभंगी॥
    
    मोहन बेनु बजावै। इहि रव नारि बुलावै।
    आई ब्रज नारि सुनत वंशी-रव, ग्रह पति बंधु बिसारे।
    दरसन मदन गुपाल मनोहर, मनसिज ताप निवारे॥
    हरषित वदन बंक अवलोकन, सरस मधुर धुनि गावै।
    मधुमय श्याम समान अधर धरि, मोहन बेनु बजावै॥
    
    रास रच्यौ वन माहीं। विमल कलपतरु छाहीं।
    विमल कलपतरु तीर सुपेसल, शरद रैन वर चन्दा।
    शीतल-मंद-सुगंध पवन बहै, तहाँ खेलत नंदनन्दा॥
    अद्भुत ताल मृदंग मनोहर, किंकिनि शब्द कराहीं।
    यमुना पुलिन रसिक रस-सागर, रास रच्यौ वन माहीं॥
    
    देखत मधुकर केली। मोहे खग मृग बेली।
    मोहे मृग-धेनु सहित सुर-सुन्दरि, प्रेम मगन पट छूटे।
    उडुगन चकित थकित शशिमंडल, कोटि मदन मन लूटे॥
    अधर पान परिरंभन अति रस, आनँद मगन सहेली।
    जै श्रीहित हरिवंश रसिक सचु पावत, देखत मधुकर केली॥

    Pada 64 — बेनु माई बाजै वंशीवट

    बेनु माई बाजै वंशीवट।
    सदा बसंत रहत वृन्दावन, पुलिन पवित्र सुभग यमुना तट॥
    जटित क्रीट मकराकृत कुण्डल, मुख अरविन्द भँवर मानों लट।
    दसनन कुंद कली छबि लज्जित, सज्जित कनक समान पीत पट॥
    मुनि मन ध्यान धरत नहिं पावत, करत विनोद संग बालक भट।
    दास अनन्य भजन रस कारन, जै श्रीहित हरिवंश प्रगट लीला नट॥

    Pada 65 — मदन-मथन घन निकुंज खेलत हरि

    मदन-मथन घन निकुंज खेलत हरि, राका रुचिर शरद रजनी।
    यमुना पुलिन तट, सुर तरु के निकट, रचित रास चलि मिलि सजनी॥
    बाजत मृदु मृदंग नाचत सबै सुधंग, तैं न श्रवन सुन्यौ बेनु बजनी।
    जै श्रीहित हरिवंश प्रभु राधिका रवन मोकौं, भावै माई जगत भगत-भजनी॥

    Pada 66 — बिहरत दोऊ प्रीतम कुंज

    बिहरत दोऊ प्रीतम कुंज।
    अनुपम गौर-श्याम तन शोभा, वन बरसत सुख पुंज॥
    अद्भुत खेत महा मनमथ कौ, दुंदुभि भूषन-राव।
    जूझत सुभट परस्पर अँग-अँग, उपजत कोटिक भाव॥
    भर संग्राम श्रमित अति अबला, निद्रायत कल नैंन।
    पिय के अंक निसंक तंक तन, आलस जुत कृत सैन॥
    लालन मिस आतुर पिय परसत, उरु नाभि उरजात।
    अद्भुत छटा विलोकि अवनि पर, विथकित वेपथ गात॥
    नागरि निरखि मदन-विष व्यापत, दियौ सुधाधर धीर।
    सत्वर उठे महा मधु पीवत, मिलत मीन मिव नीर॥
    अबही मैं मुख मध्य बिलोके, बिंबाधर सु रसाल।
    जाग्रत ज्यौं भ्रम भयौ पर्यो मन, सत मनसिज कुल जाल॥
    सकृदपि मयि अधरामृत मुपनय, सुन्दरि सहज सनेह।
    तव पद-पंकज कौ निज मंदिर, पालय सखि मम देह॥
    प्रिया कहत कहु कहाँ हुते पिय, नवनिकुंज-वर-राज।
    सुन्दर वचन रचन कत बितरत, रति-लंपट बिनु काज॥
    इतनौं श्रवन सुनत मानिनि मुख, अन्तर रह्यौ न धीर।
    मति कातर विरहज दुख व्यापत, बहुतर स्वाँस समीर॥
    जै श्रीहित हरिवंश भुजन आकर्षे, लै राखे उर माँझ।
    मिथुन मिलत जु कछुक सुख उपज्यौ, तुटि लवमिव भई साँझ॥

    Pada 67 — रुचिर राजत वधू कानन किशोरी

    रुचिर राजत वधू कानन किशोरी॥
    सरस सोडस किये तिलक मृगमद दिये, मृगज लोचन उबटि अंग शिर खोरी॥
    गंड पंडीर मंडित चिकुर चंद्रिका, मेदिनी कवरि गूँथित सुरँग डोरी।
    श्रवन ताटंक कै चिबुक पर बिंदु दै, कसूंभी कंचुकि दुरे उरज फल कोरी॥
    बलय कंकन दोत नखन जावक जोत, उदर गुन रेख, पट नील, कटि थोरी।
    सुभग जघन स्थली कुनित किंकिनि भली, कोक संगीत रस-सिंधु झक झोरी॥
    विविध लीला रचित रहसि हरिवंश हित, रसिक सिरमौर राधा रवन जोरी।
    भृकुटि निर्जित मदन मंद ससिमत वदन, किये रस विवस घन स्याम पिय गोरी॥

    Pada 68 — रास में रसिक मोहन बने भामिनी

    रास में रसिक मोहन बने भामिनी।
    सुभग पावन पुलिन सरस सौरभ नलिन, मत्त मधुकर निकर शरद की जामिनी॥
    त्रिविध रोचक पवन ताप दिनमनि दवन, तहाँ ठाढ़े रवन संग सत कामिनी।
    ताल बीना मृदंग सरस नाचत सुधंग, एक तैं एक संगीत की स्वामिनी॥
    राग रागिनि जमी विपिन बरसत अमी, अधर बिंबन रमी मुरलि अभिरामिनी।
    लाग कटूर उरप सप्त सुर सौं सुलप, लेति सुंदर सुघर राधिका नामिनी॥
    तत्त थेई थेई करत गतिव नूतन धरत, पलटि डगमग ढरति मत्त गज गामिनी।
    धाइ नवरंग धरी उरसि राजत खरी, उभय कल हंस हरिवंश घन दामिनी॥

    Pada 69 — मोहिनी मोहन रंगे प्रेम सुरंगे

    मोहिनी मोहन रंगे प्रेम सुरंगे, मत्त मुदित कल नाचत सुधंगे।
    सकल-कला प्रवीन, कल्यान रागिनी लीन, कहत न बनै माधुरी अंग-अंगे॥
    तरनि-तनया तीर, त्रिविध सखी समीर, मानौं मुनि-व्रत धर्यो कपोती कोकिला कीर।
    नागरि-नवकिशोर, मिथुन मनसि चोर, सरस गावत दोऊ मंजुल मन्दर घोर॥
    कंकन-किंकिनि धुनि, मुखर नूपुरन सुनि, जै श्रीहित हरिवंश रस बरसै नव-तरुनि॥

    Pada 70 — आजु सम्हारत नाहिन गोरी

    आजु सम्हारत नाहिन गोरी।
    फूली फिरत मत्त करिनी ज्यौं, सुरत-समुद्र झकोरी॥
    आलस बलित अरुन धूसर मषि, प्रगट करत दृग चोरी।
    पिय पर करुन अमी रस बरसत, अधर अरुनता थोरी॥
    बाँधत भृंग उरज अम्बुज पर, अलक निबन्ध किशोरी।
    संगम किरच-किरच कंचुकि बँद, सिथिल भई कटि डोरी॥
    देत असीस निरखि जुवतीजन, जिनकै प्रीति न थोरी।
    जै श्रीहित हरिवंश विपिन भूतल पर, संतत अविचल जोरी॥

    Pada 71 — श्याम सँग राधिका रासमण्डल बनी

    श्याम सँग राधिका रासमण्डल बनी।
    बीच नंदलाल ब्रजबाल चंपक बरन, ज्यौंव घन तड़ित बिच कनक-मर्कतमनी॥
    लेत गति मान तत्त थेई हस्तक भेद, स रे ग म प ध नि ये सप्त सुर नादनी।
    निर्त्त रस पहिर पट नील प्रकटित छबी, बदन जनु जलद में मकर की चाँदनी॥
    राग-रागिनि तान मान संगीत मत, थकित राकेश नभ शरद की जामिनी।
    जै श्रीहित हरिवंश प्रभु हंस कटि केहरी, दुरि कृत मदन मद मत्त गजगामिनी॥

    Pada 72 — सुन्दर पुलिन सुभग सुखदायक

    सुन्दर पुलिन सुभग सुखदायक।
    नव-नव घन अनुराग परस्पर, खेलत कुँवर नागरी नायक॥
    शीतल हंससुता रस बीचिन, परसि पवन सीकर मृदु बरसत।
    वर मन्दार कमल चंपक कुल, सौरभ सरस मिथुन मन हरसत॥
    सकल सुधंग विलास परावधि, नाचत नवल मिले सुर गावत।
    मृगज मयूर मराल भ्रमर पिक, अद्भुत कोटि मदन सिर नावत॥
    निर्मित कुसुम सयन मधु पूरित, भाजन कनक निकुंज विराजत।
    रजनी-मुख सुख-राशि परस्पर, सुरत समर दोऊ दल साजत॥
    विट-कुल-नृपति किशोरी कर धृत, बुधि बल नीवी-बंधन मोचत।
    नेति-नेति वचनामृत बोलत, प्रणय कोप प्रीतम नहिं सोचत॥
    जै श्रीहित हरिवंश रसिक ललितादिक, लता-भवन रंध्रन अवलोकत।
    अनुपम सुख भर भरित विवस असु, आनन्द-वारि कण्ठ दृग रोकत॥

    Pada 73 — खंजन मीन मृगज मद मेटत

    खंजन मीन मृगज मद मेटत, कहा कहौं नैंनन की बातैं।
    सुनि सुन्दरी कहाँ लौं सिखई, मोहन वसीकरन की घातैं॥
    बंक निसंक चपल अनियारे, अरुन श्याम सित रचे कहाँ तैं।
    डरत न हरत परायौ सर्बसु, मृदु मधु मिव मादिक दृग पातैं॥
    नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि, नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं।
    जै श्रीहित हरिवंश हंस कल-गामिनि, भावै सो करहु प्रेम के नातैं॥

    Pada 74 — काहे कौं मान बढ़ावत है, बालक मृग लोचनि

    काहे कौं मान बढ़ावत है, बालक मृग लोचनि।
    हौं व डरनि कछु कहि न सकत, इक बात सकोचनि॥
    मत्त मुरलि अंतर तव गावत, जागृत सैंन तवाकृति सोचनि।
    (जै श्री) हित हरिवंश महा मोहन पिय, आतुर विट विरहज दुख मोचनि॥

    Pada 75 — हौं जु कहत इक बात, सखी! सुनि काहे कौं डारत

    हौं जु कहत इक बात, सखी! सुनि काहे कौं डारत।
    प्रान रवन सौं क्यौंऽव करत, आगस बिनु आरत॥
    पिय चितवत तव चन्द्रवदन तन, तू अध मुख निज चरन निहारत।
    वे मृदु चिबुक प्रलोय प्रबोधत, तू भामिनि कर सौं कर टारत॥
    विवस अधीर विरह अति कातर, सर-औसर कछुवै न बिचारत।
    जै श्रीहित हरिवंश रहसि प्रीतम मिलि, तृषित नैंन काहे न प्रतिपारत॥

    Pada 76 — नागरी निकुंज ऐन किसलय दल रचित सैन

    नागरी निकुंज ऐन किसलय दल रचित सैन, कोक-कला-कुशल कुँवरि अति उदार री।
    सुरत रंग अंग-अंग हाव भाव भृकुटि भंग, माधुरी तरंग मथत कोटि मार री॥
    मुखर नूपुरन सुभाव किंकिनी विचित्र राव, विरमि-विरमि नाथ बदत वर बिहार री।
    लाड़िली किशोर राज हंस-हंसिनी समाज, सींचत हरिवंश नयन सुरस सार री॥

    Pada 77 — लटकत फिरत जुवति रस फूली

    लटकत फिरत जुवति रस फूली।
    लताभवन में सरस सकल निशि, पिय सँग सुरत-हिंडोरे झूली।
    जद्यपि अति अनुराग रसासव, पान-विवस नाहिं गति भूली।
    आलस-वलित नैंन बिगलित लट, उर पर कछुक कंचुकी खूली।
    मरगजी माल सिथिल कटि बंधन, चिलित कज्जल पीक दुकूली।
    जै श्री हित हरिवंश मदन-सर जर जर, विथकित श्याम सजीवन मूली॥

    Pada 78 — सुधंग नाँचत नवल किशोरी

    सुधंग नाँचत नवल किशोरी।
    थेई-थेई कहत चहत प्रीतम दिसि, वदनचन्द्र मनौं तृषित चकोरी॥
    तान बन्धान मान में नागरि, देखत श्याम कहत हो-हो री।
    जै श्रीहित हरिवंश माधुरी अँग-अँग, बरबस लियौ मोहन चित चोरी॥

    Pada 79 — रहसि-रहसि मोहन पिय के सँग री

    रहसि-रहसि मोहन पिय के सँग री, लड़ैती अति रस लटकत।
    सरस सुधंग अंग में नागरि, थेई-थेई कहत अवनि पद पटकत॥
    कोक कला कुल जानि शिरोमनि, अभिनय कुटिल भृकुटियन मटकत।
    विवश भये प्रीतम अलि लंपट, निरखि करज नासापुट चटकत॥
    गुन गन रसिक राइ चूड़ामनि, रिझवत पदिक हार पट झटकत।
    जै श्रीहित हरिवंश निकट दासी जन, लोचन-चषक रसासव गटकत॥

    Pada 80 — बल्लवी सु कनक-बल्लरी तमाल श्याम संग

    बल्लवी सु कनक-बल्लरी तमाल श्याम संग, लागि रही अंग-अंग मनोभिरामिनी।
    वदन जोत मनौं मयंक अलक तिलक छबि कलंक, छपत श्याम अंक मनौं जलद दामिनी॥
    बिगत-बास हेम खम्भ मनौं भुवंग बेनी-दंड, पिय के कण्ठ प्रेम-पुंज कुंज कामिनी।
    जै श्री शोभित हरिवंश नाथ साथ सुरत आलसवंत, उरज कनक कलस राधिका सुनामिनी॥

    Pada 81 — वृषभानुनन्दिनी मधुर कल गावै

    वृषभानुनन्दिनी मधुर कल गावै।
    विकट औघर तान चर्चरी ताल सौं, नन्दनन्दन मनसि मोद उपजावै॥
    प्रथम मज्जन चारु चीर कज्जल तिलक, श्रवन कुण्डल वदन चन्द्रन लजावै।
    सुभग नक बेसरी रतन हाटक जरी, अधर बंधूक दसन कुंद चमकावै॥
    वलय कंकन चारु उरसि राजत हारु, कटिव किंकिनि चरन नूपुर बजावै।
    हंस कल गामिनी मथत मद कामिनी, नखन मदयंतिका रंग रुचि द्यावै॥
    निर्त सागर रभस रहसि नागरि नवल, चन्द्र-चाली विविध भेदन जनावै।
    कोक विद्या विदित, भाइ अभिनय निपुन, भ्रू-विलासन मकरकेतन नचावै॥
    निविड़ कानन भवन, बाहु रंजित रवन, सरस आलाप सुख-पुंज बरसावै।
    उभय संगम सिंधु, सुरत पूषन-बन्धु, द्रवत मकरन्द (श्री) हरिवंश अलि पावै॥

    Pada 82 — नागरता की राशि किशोरी

    नागरता की राशि किशोरी।
    नव नागर कुल-मौलि साँवरौ, बरबस कियौ चितै मुख मोरी॥
    रूप रुचिर अँग-अँग माधुरी, बिनु भूषन भूषित ब्रज गोरी।
    छिन छिन कुशल सुधंग अंग में, कोक रभस रस-सिन्धु झकोरी॥
    चंचल रसिक मधुप मोहन मन, राखे कनक कमल कुच कोरी।
    प्रीतम नैंन जुगल खंजन खग, बाँधे विविध निबन्धन डोरी॥
    अवनी उदर नाभि सरसी में, मनौं कछुक मादिक मधु घोरी।
    जै श्रीहित हरिवंश पिवत सुन्दर वर, सींव सुदृढ़ निगमन की तोरी॥

    Pada 83 — छाँड़ि दै मानिनी मान मन धरिबौ

    छाँड़ि दै मानिनी मान मन धरिबौ।
    प्रनत सुन्दर सुघर प्रानवल्लभ नवल, वचन आधीन सौं इतौ कत करिबौ॥
    जपत हरि विवश तव नाम प्रतिपद विमल, मनसि तव ध्यान तैं निमिष नहिं टरिबौ।
    घटत पल-पल सुभग शरद की जामिनी, भामिनी सरस अनुराग दिस ढरिबौ॥
    हौं जु कछु कहत निजु बात सुनि मान सखि, सुमुखि बिनु काज घन विरह दुख भरिबौ।
    मिलत हरिवंश हित कुंज किसलय सयन, करत कल केलि सुख-सिंधु में तरिबौ॥

    Pada 84 — आजुऽव देखियत है हो प्यारी रंग भरी

    आजुऽव देखियत है हो प्यारी रंग भरी।
    मोपै न दुरत चोरी, वृषभानु की किशोरी, शिथिल कटि की डोरी, नंद के लालन सौं सुरत लरी॥
    मोतियन लर टूटी, चिकुर चन्द्रिका छूटी, रहसि रसिक लूटी, गंडन पीक परी।
    नैंनन आलस बस, अधर बिंब निरस, पुलक प्रेम परस, हित हरिवंश री राजत खरी॥
    
    !! जै जै श्रीगोस्वामी श्रीहित हरिवंशचंद्र विरचिता श्रीहित चौरासी जू की जै जै श्रीहित हरिवंश !!

    Phalashruti

    भव-जल-निधि कौ नाव, काम-पावक कौ पानी।
    प्रेम-भक्ति कौ मूल, मोद मंगल सुखदानी॥
    निगम सार सिद्धान्त, सन्त विश्राम मधुर वर।
    रसिकन कौ रस-सार, सकल अक्षर रस कौ घर॥
    चौरासी हरिवंश कृत, पढ़ें सुनै निशि-भोर।
    छुटि चौरासी भ्रमन तें, निरखै जुगल किशोर॥1॥
    
    निरखै जुगल किशोर भोर अरु रैन न जानै।
    पियै रूप रस मत्त भयौ कछु मनहिं न आनै॥
    प्रेम लक्षणा भक्ति होइ हिय आनन्द कारी।
    अरु वृन्दावन वास सखी सुख के अधिकारी॥
    कुंज महल की टहल सुख, दंपति संपति पाई है।
    (जैश्री) रूपलाल हित प्रीति सौं जो चौरासी गाइ है॥2॥

    Ashta Sakhi Jai-Jaikara

    ॥ श्री ललिता जू की जय ॥

    ॥ श्री विशाखा जू की जय ॥

    ॥ श्री चंपकलता जू की जय ॥

    ॥ श्री चित्रा जू की जय ॥

    ॥ श्री तुंगविद्या जू की जय ॥

    ॥ श्री इन्दुलेखा जू की जय ॥

    ॥ श्री रंगदेवी जू की जय ॥

    ॥ श्री सुदेवी जू की जय ॥

    ॥ समस्त सहचरी वृंद की जय ॥

    ॥ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ॥

    FAQ

    Shree Hit Chaurasi is a Braj Bhasha collection of 84 padas composed by Shree Hit Harivansh Mahaprabhu, founder of the Radhavallabh Sampradaya, describing the eternal Vrindavan pastimes of Radha-Krishna.

    There are 84 padas in total, along with an opening mangalacharan doha and two concluding phalashruti verses.

    It was composed by Shree Goswami Hit Harivanshchandra Ji, revered as the founder of the Radhavallabh Sampradaya.

    According to the phalashruti, its daily recitation acts as a boat across the ocean of worldly existence, is the root of loving devotion, and grants the merit of residing in Vrindavan and beholding the divine couple.