51 शक्तिपीठ: पूरी सूची, स्थान और कथाएँ
सभी शक्तिपीठों की पूरी सूची — देवी, भैरव, सती का कौन-सा अंग गिरा, और स्थान। भारत के साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और तिब्बत के शक्तिपीठ भी।
शक्तिपीठों की सूची बनाना उतना सीधा काम नहीं है जितना लगता है। लोग "51 शक्तिपीठ" कहते हैं, और यही संख्या सबसे अधिक प्रचलित भी है — पर जब आप असली ग्रंथ और सूचियाँ खोलकर देखते हैं, तो नाम 51 से थोड़े ऊपर-नीचे होते रहते हैं। यह लेख उसी पूरी सूची को एक जगह लाता है, साथ में यह भी बताता है कि कहाँ-कहाँ परंपराएँ आपस में सहमत नहीं हैं।
अगर आप पहली बार शक्तिपीठों के बारे में पढ़ रहे हैं, तो सती-दक्ष यज्ञ की मूल कथा और शक्तिपीठों की उत्पत्ति इस साइट के अलग लेख "शक्तिपीठ: संपूर्ण जानकारी" में विस्तार से दी गई है। यह लेख उससे आगे की बात है — पूरी नामावली।
संख्या का सवाल
अलग-अलग पुराणों में शक्तिपीठों की संख्या अलग बताई गई है — 51, 52, 64 और 108 तक। "51" की लोकप्रियता का एक कारण यह भी माना जाता है कि यह संस्कृत वर्णमाला के 51 अक्षरों से जोड़ी जाती है। पर इसे अंतिम सत्य मानकर चलना ठीक नहीं होगा: विस्तृत सूचियाँ बनाने पर नाम 56-57 तक पहुँच जाते हैं, क्योंकि कुछ स्थानों पर एक ही अंग के दो दावेदार हैं, और कुछ पीठों को कोई परंपरा गिनती है तो कोई नहीं।
इसलिए नीचे की सूची को "एक अंतिम, प्रमाणित 51" की तरह नहीं, बल्कि व्यापक रूप से स्वीकृत नामों के संकलन की तरह पढ़िए।
पश्चिम बंगाल के शक्तिपीठ
बंगाल में सबसे अधिक शक्तिपीठ हैं, और इनमें से कई बीरभूम ज़िले में केंद्रित हैं।
| देवी | भैरव | अंग | स्थान |
|---|---|---|---|
| काली | नकुलेश्वर | दाहिने पैर की उँगलियाँ | कालीघाट, कोलकाता |
| फुल्लरा | विश्वेश्वर | अधर (होंठ) | अट्टहास, बीरभूम |
| महिषमर्दिनी | वक्रनाथेश्वर | भ्रूमध्य | बक्रेश्वर, बीरभूम |
| देवगर्भा | रुरुनाथेश्वर | कटि (कमर) | कंकालीतला, बीरभूम |
| नंदिनी | नंदिकेश्वर | कंठहार | नंदिकेश्वरी, सैंथिया |
| कालिका | योगेश्वर | उदर | नलहाटेश्वरी, नलहाटी |
| बहुला | भीरुकेश्वर | बायाँ हाथ | बहुला, पूर्व बर्दवान |
| मंगल चंडिका | कपिलांबरेश्वर | दाहिनी कलाई | उज्जानी, पूर्व बर्दवान |
| योगाद्या | क्षीरकंटकेश्वर | पैर का अंगूठा | क्षीरग्राम, बर्दवान |
| किरीटेश्वरी | संवर्तेश्वर | मुकुट | किरीटेश्वरी, मुर्शिदाबाद |
| कुमारी | घंटेश्वर | दायाँ कंधा | रत्नावली, हुगली |
| कपालिनी (बर्गभीमा) | सर्वानंदेश्वर | बायाँ टखना | विभाष, तमलुक, पूर्व मेदिनीपुर |
| भ्रामरी | अंबरेश्वर | बायाँ पैर | जलपाईगुड़ी |
कालीघाट इनमें सबसे प्रसिद्ध है — कोलकाता के बीचोंबीच, और चार आदि शक्तिपीठों में गिना जाता है। कंकालीतला में देवी का "कंकाल" (अस्थि-पंजर) गिरा माना जाता है, और यहाँ मंदिर के साथ एक कुंड की भी पूजा होती है।
ओडिशा के शक्तिपीठ
| देवी | भैरव | अंग | स्थान |
|---|---|---|---|
| विमला | जगन्नाथेश्वर | पैर | विमला मंदिर, पुरी |
| बिरजा | वराहेश्वर | नाभि | बिरजा मंदिर, जाजपुर |
| तारा तारिणी | तुंबेश्वर | वक्षस्थल | कुमारी पर्वत, गंजाम |
विमला मंदिर की स्थिति अनोखी है — यह जगन्नाथ मंदिर परिसर के भीतर, दक्षिण-पश्चिम कोने में रोहिणी कुंड के पास स्थित है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जगन्नाथ जी को अर्पित भोजन तब तक महाप्रसाद नहीं बनता जब तक वह विमला देवी को अर्पित न कर दिया जाए। यानी पुरी की पूरी महाप्रसाद परंपरा इसी शक्तिपीठ से होकर गुज़रती है। मुख्य विग्रह छठी शताब्दी का माना जाता है, और वर्तमान संरचना नौवीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के काल की मानी जाती है। दुर्गा पूजा के सोलह दिनों में यहाँ की विशेष रात्रि-पूजा आज भी गोपनीय रखी जाती है।
दक्षिण भारत के शक्तिपीठ
| देवी | भैरव | अंग | स्थान |
|---|---|---|---|
| कामाक्षी | एकांबरेश्वर | ओड्याणम (नाभि-क्षेत्र) | कांचीपुरम, तमिलनाडु |
| कन्याकुमारी | निमिषेश्वर | पीठ | कन्याकुमारी, तमिलनाडु |
| नारायणी | सिहरेश्वर | ऊपरी दाँत | शुचींद्रम, तमिलनाडु |
| भ्रामराम्बिका | मल्लिकार्जुन | गर्दन | श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश |
| माणिक्यांबा | भीमेश्वर | नाभि | द्राक्षारामम, आंध्र प्रदेश |
| पुरुहूतिका | दुर्वासेश्वर | कटि-भाग | पीठापुरम, आंध्र प्रदेश |
| महालक्ष्मी | क्रोधीश | नेत्र | कोल्हापुर, महाराष्ट्र |
| भद्रकाली सप्तश्रृंगी | विकृताक्षेश्वर | दाहिनी भुजा (स्रोतों में मतभेद) | सप्तश्रृंगी, नासिक, महाराष्ट्र |
श्रीशैलम दो कारणों से खास है — यह भ्रामराम्बा शक्तिपीठ भी है और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भी। शिव और शक्ति की उपासना एक ही परिसर में। सप्तश्रृंगी नासिक के पास सात चोटियों वाली पहाड़ी पर है, और महाराष्ट्र की "साढ़े तीन शक्तिपीठ" परंपरा में इसे "आधा" पीठ माना जाता है।
उत्तर और मध्य भारत के शक्तिपीठ
| देवी | भैरव | अंग | स्थान |
|---|---|---|---|
| विशालाक्षी | कालभैरवेश्वर | कर्णकुंडल | वाराणसी, उत्तर प्रदेश |
| ललिता / अलोपी | भवेश्वर | अंगुली | अलोपी देवी, प्रयागराज |
| कात्यायनी | भूतेश्वर | केश-गुच्छ | वृंदावन, उत्तर प्रदेश |
| शारदा | चंडेश्वर | कंठहार | मैहर, मध्य प्रदेश |
| अवंती | लंबकर्णेश्वर | कोहनी | उज्जैन, मध्य प्रदेश |
| नर्मदा (शोणाक्षी) | भद्रसेनेश्वर | दायाँ नितंब | अमरकंटक, मध्य प्रदेश |
| जयदुर्गा | वैद्यनाथ | हृदय | बैद्यनाथ धाम, देवघर, झारखंड |
| दंतेश्वरी | कपाल भैरव | दाँत | दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़ |
| उग्रतारा | — | बाईं आँख | महिषी, सहरसा, बिहार |
| भद्रकाली | स्थाणु | टखने की हड्डी | कुरुक्षेत्र (थानेसर), हरियाणा |
| त्रिपुरमालिनी | भीषणेश्वर | बायाँ वक्ष | देवी तालाब, जालंधर, पंजाब |
| गायत्री | सर्वानंदेश्वर | कलाइयाँ (मणिबंध) | मणिबंध, पुष्कर, राजस्थान |
| अंबिका | अमृताक्षेश्वर | बाएँ पैर की उँगलियाँ | भरतपुर, राजस्थान |
| चंद्रभागा | वक्रतुंडेश्वर | उदर | वेरावल (सोमनाथ के निकट), गुजरात |
| अंबा | बटुक भैरव | हृदय | अंबाजी, गब्बर पर्वत, गुजरात |
बैद्यनाथ धाम एक और दोहरा स्थल है — यह ज्योतिर्लिंग भी है और शक्तिपीठ भी, जहाँ सती का हृदय गिरा माना जाता है। इसीलिए इसे "हृदयपीठ" भी कहा जाता है। दंतेश्वरी मंदिर बस्तर के राजवंश की कुलदेवी का स्थान है, और छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल की सबसे बड़ी देवी-परंपरा यहीं से जुड़ी है।
हिमालयी क्षेत्र के शक्तिपीठ
| देवी | भैरव | अंग | स्थान |
|---|---|---|---|
| ज्वालामुखी (अंबिका) | उन्मत्त भैरव | जिह्वा | ज्वालाजी, कांगड़ा, हिमाचल |
| जयदुर्गा (बज्रेश्वरी) | अभिरुनाथेश्वर | बायाँ वक्ष | कांगड़ा, हिमाचल |
| महिषमर्दिनी | क्रोधीश्वर | दाहिनी आँख | नैना देवी, हिमाचल |
| महामाया | त्रिसंध्येश्वर | कंठ | अमरनाथ, जम्मू-कश्मीर |
| वाराही | महारुद्र | निचले दाँत | पंचसागर, चंपावत, उत्तराखंड |
| जयंती | क्रमादीश्वर | बाईं जंघा | नर्तियांग, मेघालय |
| त्रिपुर सुंदरी | कामेश्वर | दायाँ पैर | उदयपुर, त्रिपुरा |
| कामाख्या | उमानंदेश्वर | योनि | नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी, असम |
ज्वालामुखी में कोई मूर्ति नहीं है — चट्टान की दरारों से निकलती प्राकृतिक ज्वालाएँ ही देवी का स्वरूप मानी जाती हैं। कामाख्या को अधिकतर परंपराएँ सबसे प्रमुख शक्तिपीठ मानती हैं।
भारत के बाहर के शक्तिपीठ
यह हिस्सा अक्सर छूट जाता है, पर परंपरागत सूची भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है।
पाकिस्तान — हिंगलाज माता
बलूचिस्तान के लासबेला ज़िले में, हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान की एक सँकरी घाटी में स्थित हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान की सबसे बड़ी हिंदू तीर्थयात्रा का केंद्र है। परंपरा के अनुसार यहाँ सती के सिर का ऊपरी भाग (ब्रह्मरंध्र) गिरा था।
अप्रैल में होने वाली चार दिन की हिंगलाज यात्रा में हाल के वर्षों में लगभग तीन लाख श्रद्धालु शामिल होते रहे हैं। यात्रा पारंपरिक रूप से कराची के नानद पंथी अखाड़े से शुरू होती है, बीच में चंद्रगुप मिट्टी-ज्वालामुखी पर रुककर श्रद्धालु अपने दोषों का स्वीकार करते हैं, फिर हिंगोल नदी में स्नान कर गुफा-मंदिर तक पहुँचते हैं। पहले यह 240 किलोमीटर से अधिक का कठिन रेगिस्तानी सफ़र था; मकरान तटीय राजमार्ग बनने के बाद पहुँचना काफ़ी आसान हो गया है।
एक बात जो इस स्थान को और उल्लेखनीय बनाती है — स्थानीय मुसलमान, विशेषकर ज़िकरी समुदाय, भी इसमें शामिल होते हैं और इसे "नानी मंदिर" कहते हैं। सूफ़ी संत शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई ने भी यहाँ की यात्रा की और अपनी कविता में इसका उल्लेख किया।
बांग्लादेश
| देवी | भैरव | अंग | स्थान |
|---|---|---|---|
| सुगंधा | त्र्यंबकेश्वर | नासिका | शिकारपुर, बरिशाल |
| अपर्णा | वामनेश्वर | बायाँ पायल | भवानीपुर, बागेरहाट |
| यशोरेश्वरी | चंडेश्वर | हथेलियाँ व तलवे | ईश्वरीपुर, सातखीरा |
नेपाल
| देवी | भैरव | अंग | स्थान |
|---|---|---|---|
| गुह्यकाली | पशुपति | गुह्य भाग | गुह्येश्वरी, बागमती तट, काठमांडू |
| महामाया | कपाली | दोनों घुटने | काठमांडू |
| गंडकी चंडी | चक्रपाणि | कपाल (सिर) | मुक्तिनाथ |
| उमा | महोदरेश्वर | बायाँ कंधा | मिथिला, जनकपुर |
गुह्येश्वरी और महामाया — दोनों काठमांडू में हैं, पर अलग-अलग स्थान हैं; इन्हें एक मान लेने की भूल आम है।
श्रीलंका
| देवी | भैरव | अंग | स्थान |
|---|---|---|---|
| इंद्राक्षी | राक्षसेश्वर | पायल (सिलंबु) | नैनातिवु |
| शंकरी | त्रिकोणेश्वर | जंघा-संधि | कोणेश्वरम, त्रिंकोमाली |
त्रिंकोमाली के शंकरी देवी स्थल के बारे में ईमानदारी से कहना ज़रूरी है — इसकी ऐतिहासिक पहचान अनिश्चित मानी जाती है, और यह दावा अपेक्षाकृत हाल का है।
तिब्बत
मानसरोवर झील के पास, कैलाश पर्वत के निकट एक शिला-स्थल को दाक्षायणी शक्तिपीठ माना जाता है, जहाँ सती का दाहिना हाथ गिरा था। भैरव यहाँ कैलाशनाथ हैं।
शारदा पीठ — जो अब पहुँच से बाहर है
कश्मीर की शारदा पीठ का उल्लेख किए बिना यह सूची अधूरी रहेगी। यह प्राचीन काल में विद्या का बड़ा केंद्र थी, पर आज इसके खंडहर नियंत्रण-रेखा के पार पाकिस्तान-प्रशासित क्षेत्र में हैं और श्रद्धालुओं के लिए सामान्यतः दुर्गम हैं। 2023 में कुपवाड़ा ज़िले में एक नया शारदा मंदिर बनाया गया, और कर्नाटक के शृंगेरी स्थित शारदा पीठ को भी कई भक्त इसी परंपरा से जोड़कर पूजते हैं।
जहाँ परंपराएँ आपस में सहमत नहीं हैं
कुछ बातें साफ़ कह देना ज़रूरी है, क्योंकि अधिकतर सूचियाँ इन्हें छिपा जाती हैं:
- विंध्यवासिनी (मिर्ज़ापुर) को व्यापक रूप से शक्तिपीठ माना और पूजा जाता है, पर इससे सती का कोई विशेष अंग जुड़ा हुआ नहीं बताया जाता।
- अमरनाथ को कुछ सूचियाँ कंठ का स्थान बताती हैं, कुछ पायल का, और कुछ इसे श्री पर्वत नामक अलग स्थान से जोड़ती हैं।
- विमला (पुरी) को कुछ ग्रंथ पूर्ण पीठ मानते हैं, तो *पीठनिर्णय* की एक व्याख्या इसे उप-पीठ बताती है।
- सप्तश्रृंगी (नासिक) के बारे में सामान्य सूचियाँ ठुड्डी का उल्लेख करती हैं, जबकि मंदिर से जुड़े विवरण दाहिनी भुजा बताते हैं। महाराष्ट्र की परंपरा इसे "आधा" पीठ मानती है, पर मंदिर प्रशासन स्वयं इसे पूर्ण पीठ कहता है।
- कई स्थानों पर देवी का नाम, भैरव का नाम और गिरे हुए अंग — तीनों स्थानीय परंपरा के अनुसार बदल जाते हैं।
यह विविधता कोई गड़बड़ी नहीं है। शक्ति-उपासना सैकड़ों वर्षों में पूरे उपमहाद्वीप में फैली, और हर क्षेत्र ने अपनी स्थानीय देवी को इस बड़ी कथा से जोड़ा। सूचियाँ इसी प्रक्रिया का रिकॉर्ड हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शक्तिपीठ वास्तव में कितने हैं?
कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है। पुराणों में 51, 52, 64 और 108 — चारों संख्याएँ मिलती हैं। "51" सबसे प्रचलित है, पर विस्तृत सूचियाँ बनाने पर नाम 56-57 तक पहुँच जाते हैं।
सबसे प्रमुख शक्तिपीठ कौन-सा है?
अधिकतर परंपराएँ गुवाहाटी की कामाख्या को सर्वोच्च मानती हैं। चार "आदि शक्तिपीठ" के रूप में कामाख्या, विमला (पुरी), कालीघाट और तारा तारिणी गिने जाते हैं।
क्या सभी शक्तिपीठ भारत में हैं?
नहीं। पाकिस्तान (हिंगलाज, शारदा पीठ), बांग्लादेश (सुगंधा, यशोरेश्वरी, भवानीपुर), नेपाल (गुह्येश्वरी, मुक्तिनाथ, जनकपुर, काठमांडू), श्रीलंका (नैनातिवु, त्रिंकोमाली) और तिब्बत (मानसरोवर) में भी शक्तिपीठ हैं।
कौन-से शक्तिपीठ ज्योतिर्लिंग भी हैं?
श्रीशैलम (भ्रामराम्बा + मल्लिकार्जुन), उज्जैन (अवंती + महाकालेश्वर), वाराणसी (विशालाक्षी + काशी विश्वनाथ) और देवघर (जयदुर्गा + वैद्यनाथ) — इन स्थानों पर शिव और शक्ति दोनों की उपासना होती है।
भैरव का सूची में क्या महत्व है?
हर शक्तिपीठ पर देवी के साथ शिव का एक रूप भी स्थापित माना जाता है, जिसे भैरव कहते हैं। परंपरा में देवी के दर्शन के बाद उस स्थान के भैरव के दर्शन भी आवश्यक माने जाते हैं।