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    भारत के प्रसिद्ध गणेश मंदिर

    मुंबई के सिद्धिविनायक, महाराष्ट्र के अष्टविनायक, पुणे के दगडूशेठ हलवाई और आंध्र प्रदेश के कणिपाकम सहित भारत के प्रमुख गणेश मंदिरों का इतिहास।

    भगवान गणेश के मंदिर भारत भर में मिलते हैं, और महाराष्ट्र में तो इनकी एक पूरी तीर्थ-परंपरा ही विकसित हुई है। यहाँ भारत के कुछ सबसे प्रमुख गणेश मंदिरों का इतिहास दिया गया है।

    सिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई (महाराष्ट्र)

    मुंबई के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में गिना जाने वाला यह मंदिर 1801 में लक्ष्मण विठु और देउबाई पाटिल द्वारा बनवाया गया था। यहाँ की मूर्ति की सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई है, जिसे विशेष रूप से शुभ पर साथ ही अधिक कठोर पूजा-नियमों वाला माना जाता है। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मंदिर की लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ी, और आज यहाँ फ़िल्मी सितारों से लेकर आम श्रद्धालु तक, प्रतिदिन हज़ारों लोग दर्शन के लिए पहुँचते हैं। मंगलवार को यहाँ विशेष रूप से लंबी कतारें लगती हैं।

    अष्टविनायक — महाराष्ट्र के आठ गणेश मंदिर

    पुणे के आसपास केंद्रित अष्टविनायक यात्रा महाराष्ट्र की सबसे प्रसिद्ध तीर्थ-परंपराओं में से एक है, जिसमें आठ प्राचीन गणेश मंदिरों के दर्शन किए जाते हैं:

    मंदिरस्थानज़िला
    मोरेश्वरमोरगाँवपुणे
    सिद्धिविनायकसिद्धटेकअहिल्यानगर
    बल्लालेश्वरपालीरायगढ़
    वरदविनायकमहाड़रायगढ़
    चिंतामणिथेऊरपुणे
    गिरिजात्मजलेण्याद्रीपुणे
    विघ्नेश्वरओझरपुणे
    महागणपतिरांजणगाँवपुणे

    परंपरा के अनुसार यह यात्रा मोरगाँव से आरंभ होती है, और शेष सातों मंदिरों के दर्शन के बाद यात्रा पूर्ण करने के लिए मोरगाँव लौटकर दोबारा दर्शन करना आवश्यक माना जाता है।

    दगडूशेठ हलवाई गणपति मंदिर, पुणे (महाराष्ट्र)

    इस मंदिर की स्थापना 1893 में दगडूशेठ हलवाई नामक एक मिठाई व्यापारी ने की थी, जिन्होंने प्लेग महामारी में अपने पुत्र को खो दिया था और इस क्षति से उबरने के लिए गणेश जी की मूर्ति स्थापित की। स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक ने इसी दौर में सार्वजनिक गणेशोत्सव को बढ़ावा देने के लिए पुणे में कई स्थानों पर सामूहिक उत्सव आयोजित करवाए, जिससे यह परंपरा और लोकप्रिय हुई। मंदिर की मुख्य मूर्ति लगभग 7.5 फीट ऊँची और 4 फीट चौड़ी है, जिसे लगभग 8 किलोग्राम सोने और कई रत्नों से सजाया गया है।

    कणिपाकम वरसिद्धि विनायक मंदिर (आंध्र प्रदेश)

    चित्तूर ज़िले के कणिपाकम में स्थित यह मंदिर मूल रूप से ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में चोल सम्राट कुलोत्तुंग प्रथम द्वारा बनवाया गया, और 1336 में विजयनगर शासकों के काल में इसका विस्तार हुआ। इसके पीछे एक अनोखी कथा है — तीन भाई, जो क्रमशः गूँगे, बहरे और अंधे थे, कुआँ खोद रहे थे, तभी उनका औज़ार किसी कठोर वस्तु से टकराया और वहाँ से रक्त बहने लगा। इसके बाद तीनों भाइयों की खोई हुई इंद्रियाँ चमत्कारिक रूप से ठीक हो गईं, और वहाँ गणेश जी की एक मूर्ति मिली। इस मूर्ति का आधार आज तक नहीं मिल सका है — यह स्थायी रूप से जल से भरे एक कुएँ में डूबी रहती है। एक विशेष और दिलचस्प मान्यता यह भी है कि यह मूर्ति समय के साथ आकार में बढ़ती जा रही है — लगभग पचास वर्ष पहले जो कवच मूर्ति पर फिट आता था, वह अब नहीं आता।

    अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

    सिद्धिविनायक मंदिर की स्थापना कब हुई?

    1801 में लक्ष्मण विठु और देउबाई पाटिल द्वारा।

    अष्टविनायक यात्रा में कितने मंदिर शामिल हैं और यह कहाँ से शुरू होती है?

    आठ मंदिर, जो मुख्यतः पुणे, रायगढ़ और अहिल्यानगर ज़िलों में स्थित हैं। यात्रा मोरगाँव से शुरू होती है, और पूर्ण मानी जाने के लिए अंत में वहीं लौटना ज़रूरी होता है।

    दगडूशेठ हलवाई गणपति मंदिर की स्थापना क्यों हुई?

    मिठाई व्यापारी दगडूशेठ हलवाई ने प्लेग में अपने पुत्र को खोने के बाद, इस क्षति से उबरने के लिए 1893 में गणेश जी की मूर्ति स्थापित की थी।

    कणिपाकम मंदिर की मूर्ति को लेकर क्या मान्यता है?

    माना जाता है कि यह मूर्ति समय के साथ आकार में बढ़ रही है, और यह स्थायी रूप से जल से भरे एक कुएँ में डूबी रहती है, जिसका आधार आज तक नहीं मिल सका।

    कणिपाकम मंदिर का निर्माण किसने करवाया?

    इसका मूल निर्माण चोल सम्राट कुलोत्तुंग प्रथम ने ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में करवाया, और 1336 में विजयनगर शासकों के काल में इसका विस्तार हुआ।