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    जगन्नाथ मंदिर: इतिहास और रथ यात्रा

    पुरी के जगन्नाथ मंदिर का इतिहास, अधूरी मूर्तियों की कथा, विश्व-प्रसिद्ध रसोई, और हर साल निकलने वाली रथ यात्रा का महत्व।

    ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर, चार धामों में से एक, अपनी अनोखी काष्ठ-निर्मित मूर्तियों, विशाल रसोई और विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा के लिए जाना जाता है — इसी उत्सव से अंग्रेज़ी भाषा में "जगरनॉट" (juggernaut) शब्द भी आया।

    मंदिर का इतिहास

    पौराणिक कथा के अनुसार सतयुग में राजा इंद्रद्युम्न ने मूल मंदिर का निर्माण करवाया था, पर यह परंपरा और श्रद्धा का विषय है, दस्तावेज़ी इतिहास का नहीं। ऐतिहासिक रूप से दर्ज तथ्य यह है कि पूर्वी गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने लगभग 1112 ईस्वी में वर्तमान मंदिर के बड़े पुनर्निर्माण की शुरुआत करवाई, और 1134-35 ईस्वी के एक शिलालेख में उनके द्वारा मंदिर को दिए गए दान का उल्लेख मिलता है।

    अधूरी मूर्तियों की कथा

    जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा — तीनों मूर्तियाँ पवित्र नीम की लकड़ी (दारु) से बनी हैं और रत्नवेदी पर स्थापित हैं। इनके पीछे एक प्रसिद्ध कथा है: कहा जाता है कि दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा ने इस शर्त पर मूर्तियाँ बनाने का कार्य स्वीकार किया कि उन्हें बिना विघ्न काम करने दिया जाए। कुछ दिनों बाद रानी की उत्सुकता के कारण द्वार खोल दिया गया, जिससे विश्वकर्मा अधूरा काम छोड़कर चले गए — इसीलिए मूर्तियों के हाथ नहीं बने। परंपरा में कहा जाता है कि एक दैवीय वाणी ने इन्हें इसी रूप में स्थापित करने का निर्देश दिया, यह मानते हुए कि हाथ न होते हुए भी भगवान सारे संसार की रक्षा करते हैं।

    नवकलेवार — मूर्तियों का नवीनीकरण

    हर 8, 12 या 19 वर्ष में (चंद्र मास के विशेष संयोग के अनुसार) नवकलेवार नामक अनुष्ठान होता है, जिसमें पुरानी काष्ठ-मूर्तियों को नई मूर्तियों से बदला जाता है, और पुरानी मूर्तियों को कोइली वैकुंठ नामक स्थान पर विधिपूर्वक दफनाया जाता है। 2015 में हुए नवकलेवार में तीस लाख से अधिक श्रद्धालु उपस्थित हुए थे।

    मंदिर की संरचना

    मंदिर का मुख्य शिखर गर्भगृह से लगभग 65 मीटर ऊँचा है, और यह कलिंग स्थापत्य शैली में बना है। शिखर के ऊपर अष्टधातु (आठ धातुओं की मिश्रधातु) से बना नीलचक्र स्थापित है। पूरा परिसर लगभग 10 एकड़ में फैला है, जिसमें 120 से अधिक छोटे-बड़े मंदिर हैं।

    विश्व की दूसरी सबसे बड़ी रसोई

    जगन्नाथ मंदिर की रसोई (रोसाघर) को विश्व की दूसरी सबसे बड़ी रसोई बताया जाता है, जहाँ प्याज़-लहसुन के बिना 56 प्रकार के शुद्ध शाकाहारी व्यंजन (महाप्रसाद) तैयार किए जाते हैं। परंपरा में माना जाता है कि देवी लक्ष्मी स्वयं प्रसाद की गुणवत्ता की देखरेख करती हैं, और यदि कोई भोग दोषपूर्ण बने तो एक "छाया कुत्ता" प्रकट होने की मान्यता है, जिसे देवी के असंतोष का संकेत माना जाता है — ऐसी स्थिति में उस भोग को दफनाकर नया भोग बनाया जाता है।

    गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध

    जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबियों को छोड़कर अन्य गैर-हिंदुओं और विदेशी नागरिकों को मंदिर के भीतरी परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं है। यह नियम मंदिर की स्थापना काल से चला आ रहा माना जाता है, और आज भी यह एक चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है।

    रथ यात्रा

    आषाढ़ मास (जून-जुलाई) में निकलने वाली रथ यात्रा भारत की सबसे बड़ी और सबसे अधिक देखी जाने वाली रथ-यात्राओं में गिनी जाती है। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा — तीनों को अलग-अलग विशाल रथों पर बिठाकर मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है। जगन्नाथ जी का रथ लगभग 14 मीटर ऊँचा और 11 मीटर चौड़ा होता है, और इसे बनाने में लगभग दो महीने लगते हैं। इन्हीं विशाल रथों से अंग्रेज़ी शब्द "जगरनॉट" (juggernaut) बना, जो किसी बड़ी, रोकी न जा सकने वाली शक्ति के लिए प्रयोग होता है।

    यात्रा के दौरान छेरा पहरा नामक अनुष्ठान भी होता है, जिसमें पुरी के गजपति राजा स्वयं सफ़ाईकर्मी का वेश धारण कर सोने की मूठ वाली झाड़ू से रथ-मार्ग की सफ़ाई करते हैं — यह प्रतीक है कि जगन्नाथ के समक्ष राजा से लेकर सामान्य जन तक सभी समान हैं।

    रथ यात्रा का उल्लेख पश्चिमी जगत को मिलने वाले सबसे प्रारंभिक हिंदू उत्सव-विवरणों में से एक माना जाता है — इतालवी यात्री ओडोरिक ऑफ़ पोर्देनोने ने 1316-1318 के भारत भ्रमण के आधार पर 1321 में इसका वर्णन लिखा था। आज इस्कॉन के माध्यम से यह उत्सव 1968 से मॉस्को से दुबई तक, विश्व के 100 से अधिक शहरों में मनाया जाता है।

    अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

    जगन्नाथ मंदिर का ऐतिहासिक निर्माण किसने करवाया?

    पौराणिक कथा राजा इंद्रद्युम्न से इसे जोड़ती है, पर दस्तावेज़ी इतिहास के अनुसार वर्तमान मंदिर का बड़ा पुनर्निर्माण पूर्वी गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने लगभग 1112 ईस्वी में करवाया था।

    जगन्नाथ जी की मूर्तियों के हाथ क्यों नहीं हैं?

    कथा के अनुसार दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा को बीच में ही काम छोड़कर जाना पड़ा, क्योंकि शर्त के विपरीत उन्हें काम के दौरान बिना अनुमति देखा गया, जिससे मूर्तियाँ अधूरी और बिना हाथ की रह गईं।

    नवकलेवार क्या है?

    यह हर 8, 12 या 19 वर्ष में होने वाला अनुष्ठान है, जिसमें पुरानी काष्ठ-मूर्तियों को नई मूर्तियों से बदला जाता है।

    रथ यात्रा में रथ कितने बड़े होते हैं और कहाँ जाते हैं?

    जगन्नाथ जी का रथ लगभग 14 मीटर ऊँचा होता है। तीनों रथ मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं, और इन्हीं विशाल रथों से अंग्रेज़ी शब्द "जगरनॉट" बना है।

    जगन्नाथ मंदिर में किन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं है?

    जैन, सिख और बौद्धों को छोड़कर, अन्य गैर-हिंदुओं और विदेशी नागरिकों को मंदिर के भीतरी परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं है।