धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥1॥
धृतराष्ट्र ने पूछा: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठा हुए मेरे पुत्रों और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?
अध्याय 1 · 47 श्लोक
अर्जुनविषादयोग
पूरा अध्याय युद्ध शुरू होने से पहले के कुछ मिनटों का है। दोनों सेनाएँ आमने-सामने हैं, शंख बज चुके हैं, और अर्जुन कृष्ण से रथ बीच में ले चलने को कहते हैं। सामने खड़े लोगों में उन्हें अपने ही गुरु, ताऊ-चाचा, भाई और मित्र दिखते हैं। यहीं उनका शरीर काँपने लगता है, गांडीव हाथ से छूटने लगता है, और वे तर्क देने लगते हैं कि इस युद्ध से कुल टूटेगा, परंपरा मिटेगी और पाप ही हाथ आएगा। अध्याय के अंत में वे धनुष रखकर रथ में बैठ जाते हैं। गीता का उपदेश इसी बिंदु से शुरू होता है।
अर्जुन का टूटना ही वह प्रश्न है जिसका उत्तर बाकी सत्रह अध्याय हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥1॥
धृतराष्ट्र ने पूछा: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठा हुए मेरे पुत्रों और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?
संजय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥2॥
संजय बोले: पांडवों की सेना को व्यूह में सजा देखकर राजा दुर्योधन आचार्य द्रोण के पास गया और उनसे यह कहा।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥3॥
आचार्य, पांडुपुत्रों की इस बड़ी सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने खड़ा किया है।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥4॥
इसमें बड़े धनुर्धर शूरवीर हैं, जो युद्ध में भीम और अर्जुन के बराबर हैं: युयुधान, विराट और महारथी द्रुपद।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥5॥
धृष्टकेतु, चेकितान, पराक्रमी काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य भी हैं।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥6॥
पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्र, ये सब भी महारथी हैं।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥7॥
हे द्विजश्रेष्ठ! अब हमारी ओर के प्रमुख योद्धाओं को भी जान लीजिए। आपको स्मरण कराने के लिए मैं अपनी सेना के नायकों के नाम गिनाता हूँ।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥8॥
आप स्वयं, भीष्म, कर्ण, संग्रामविजयी कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।
पाठभेद: सौमदत्तिर्जयद्रथः (कुछ संस्करणों में)
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥9॥
और भी बहुत से शूरवीर हैं जिन्होंने मेरे लिए अपने प्राण तक छोड़ रखे हैं। सब अनेक शस्त्रों से सुसज्जित और युद्ध में निपुण हैं।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥10॥
भीष्म से रक्षित हमारी यह सेना अपर्याप्त है, और भीम से रक्षित इनकी सेना पर्याप्त है। (यह श्लोक उलटकर भी पढ़ा जाता है: हमारी सेना अपरिमित है, इनकी सीमित।)
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥11॥
इसलिए आप सब अपने-अपने मोर्चों पर, अपनी-अपनी जगह डटे रहकर, हर ओर से भीष्म पितामह की ही रक्षा करें।
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥12॥
तब कुरुवंश के वृद्ध प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के मन में हर्ष भरते हुए सिंह की तरह गरजकर ऊँचे स्वर में शंख बजाया।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥13॥
उसके बाद शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंघे एक साथ बज उठे। वह आवाज़ बहुत भयंकर थी।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥14॥
फिर सफेद घोड़ों वाले विशाल रथ पर बैठे श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाए।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥15॥
हृषीकेश ने पांचजन्य, धनंजय ने देवदत्त और भयानक कर्म करने वाले भीम ने पौण्ड्र नाम का महाशंख बजाया।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥16॥
कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय, नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक शंख बजाया।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥17॥
श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखंडी, धृष्टद्युम्न, विराट और अजेय सात्यकि ने भी शंख बजाए।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥18॥
हे राजन्! द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्र और महाबाहु अभिमन्यु, इन सबने अलग-अलग अपने शंख बजाए।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् ॥19॥
वह भयंकर शब्द आकाश और पृथ्वी को गुँजाता हुआ धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय चीर गया।
पाठभेद: तुमुलो व्यनुनादयन् (गीता प्रेस सहित कई संस्करणों में)
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥20॥
हे राजन्! तब शस्त्र चलने ही वाले थे, और कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चे पर खड़े कौरवों को देखकर धनुष उठाया।
संजय उवाच
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाचसेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥21॥
और हृषीकेश से यह कहा: हे अच्युत! मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए,
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥22॥
जब तक मैं युद्ध की इच्छा से खड़े इन लोगों को देख न लूँ कि इस लड़ाई में मुझे किनके साथ लड़ना है।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥23॥
मैं उन्हें देख लूँ जो लड़ने आए हैं, जो दुर्बुद्धि दुर्योधन का भला करने के लिए यहाँ इकट्ठा हुए हैं।
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥24॥
संजय बोले: हे भारत! अर्जुन के ऐसा कहने पर हृषीकेश ने दोनों सेनाओं के बीच में वह श्रेष्ठ रथ खड़ा कर दिया।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥25॥
भीष्म और द्रोण के सामने, और सब राजाओं के सामने, उन्होंने कहा: हे पार्थ! इकट्ठे हुए इन कुरुओं को देख।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥26॥
वहाँ अर्जुन ने दोनों सेनाओं में खड़े अपने पिता समान बड़ों, पितामहों, गुरुजनों, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को देखा।
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥27॥
ससुर और हितैषी भी वहीं थे। दोनों सेनाओं में खड़े इन सब बंधुओं को देखकर कुंतीपुत्र अर्जुन
संजय उवाच
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
अर्जुन उवाचदृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥28॥
गहरी करुणा से भर गया और दुखी होकर बोला: हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से आए अपने ही लोगों को देखकर
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥29॥
मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुँह सूख रहा है, शरीर काँप रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥30॥
गांडीव हाथ से खिसक रहा है, त्वचा जल रही है। मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा, मेरा मन घूम रहा है।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥31॥
हे केशव! मुझे लक्षण भी उलटे दिख रहे हैं। युद्ध में अपने ही लोगों को मारकर मुझे कोई भलाई नहीं दिखती।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥32॥
हे कृष्ण! मुझे न विजय चाहिए, न राज्य, न सुख। हे गोविंद! ऐसे राज्य से, भोगों से, यहाँ तक कि जीने से भी क्या?
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥33॥
जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वही अपने प्राण और धन छोड़कर युद्ध में खड़े हैं।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥34॥
गुरुजन, बड़े-बूढ़े, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, साले और दूसरे संबंधी, सब यहीं हैं।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥35॥
हे मधुसूदन! ये मुझे मार भी डालें तो भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता। तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, फिर इस पृथ्वी के लिए तो क्या ही।
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥36॥
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या सुख मिलेगा? इन आततायियों को मारकर हमें पाप ही लगेगा।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥37॥
इसलिए अपने ही बांधव धृतराष्ट्रपुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं। हे माधव! अपने ही लोगों को मारकर हम सुखी कैसे होंगे?
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥38॥
लोभ ने इनकी बुद्धि हर ली है, इसलिए इन्हें कुल के नाश का दोष और मित्र से द्रोह का पाप नहीं दिखता।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥39॥
पर हे जनार्दन! जिन्हें यह दोष दिखता है, वे इस पाप से क्यों न हटें?
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥40॥
कुल के नाश से कुल की सनातन परंपराएँ नष्ट हो जाती हैं, और परंपरा नष्ट होने पर पूरे कुल में अधर्म फैल जाता है।
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥41॥
हे कृष्ण! अधर्म बढ़ने पर कुल की स्त्रियाँ दूषित होती हैं, और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥42॥
वह संकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाता है। पिंड और जल न मिलने से इनके पितर भी गिर जाते हैं।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥43॥
वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले इन दोषों से कुलघातियों की जाति-परंपरा और कुल-परंपरा, दोनों नष्ट हो जाती हैं।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥44॥
हे जनार्दन! हमने यही सुना है कि जिनकी कुल-परंपरा नष्ट हो जाती है, उन मनुष्यों का नरक में वास निश्चित है।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥45॥
हाय! हम बड़ा पाप करने पर तुले हैं, जो राज्य-सुख के लोभ से अपने ही लोगों को मारने को तैयार हो गए।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥46॥
यदि शस्त्रधारी धृतराष्ट्रपुत्र मुझ निहत्थे और सामना न करने वाले को युद्ध में मार डालें, तो वह भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥47॥
संजय बोले: ऐसा कहकर शोक से भरे मन वाला अर्जुन बाण सहित धनुष फेंककर युद्धभूमि में रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
संस्कृत पाठ तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर जाँचा गया है। अर्थ किसी प्रकाशित अनुवाद से नहीं लिया गया, संस्कृत से सीधे सरल भाषा में लिखा गया है।
श्री कृष्ण की सभी सामग्री देखें →भगवद्गीता के अध्याय 1 में कितने श्लोक हैं?
अध्याय 1 "अर्जुन विषाद योग" में 47 श्लोक हैं।
गीता का अध्याय 1 किस विषय में है?
पूरा अध्याय युद्ध शुरू होने से पहले के कुछ मिनटों का है। दोनों सेनाएँ आमने-सामने हैं, शंख बज चुके हैं, और अर्जुन कृष्ण से रथ बीच में ले चलने को कहते हैं। सामने खड़े लोगों में उन्हें अपने ही गुरु, ताऊ-चाचा, भाई और मित्र दिखते हैं। यहीं उनका शरीर काँपने लगता है, गांडीव हाथ से छूटने लगता है, और वे तर्क देने लगते हैं कि इस युद्ध से कुल टूटेगा, परंपरा मिटेगी और पाप ही हाथ आएगा। अध्याय के अंत में वे धनुष रखकर रथ में बैठ जाते हैं। गीता का उपदेश इसी बिंदु से शुरू होता है।