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    अध्याय 18 · 78 श्लोक

    मोक्ष संन्यास योग

    मोक्षसंन्यासयोग

    इस अध्याय में

    सबसे लंबा अध्याय, और काफी हद तक सारांश। संन्यास और त्याग का अंतर, कर्म के पाँच कारण, और फिर ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख, हर एक के तीन-तीन रूप। स्वभाव के अनुसार काम के बँटवारे की बात भी यहीं है, और वह पंक्ति दोहराई जाती है कि दूसरे का धर्म अच्छी तरह निभाने से अपना धर्म अधूरा निभाना बेहतर है। अंत में वह श्लोक आता है जिसे बहुत लोग पूरी गीता का निचोड़ मानते हैं: सब छोड़कर मेरी शरण में आ जा। फिर कृष्ण एक बात कहते हैं जो कम ध्यान में आती है: सोच-विचार कर लो, और फिर जैसा चाहो वैसा करो। अर्जुन कहते हैं मोह गया, और खड़े हो जाते हैं।

    मुख्य बात

    सब छोड़कर शरण में आ जा। और फिर भी: सोच-विचार करके, जैसा चाहो वैसा करो।

    श्लोक

    अर्जुन उवाच

    18.1

    संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
    त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥1॥

    अर्जुन बोले: हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास का और त्याग का तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।

    श्रीभगवान उवाच

    18.2

    काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
    सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥2॥

    श्रीभगवान बोले: कामना से किए जाने वाले कर्मों को छोड़ देने को कवि संन्यास कहते हैं। सब कर्मों के फल का त्याग करने को विचारशील लोग त्याग कहते हैं।

    18.3

    त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
    यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥3॥

    कुछ मनीषी कहते हैं कि कर्म दोष की तरह त्यागने योग्य है, और दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप के कर्म त्यागने योग्य नहीं।

    18.4

    निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
    त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥4॥

    हे भरतश्रेष्ठ! त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुन। हे पुरुषव्याघ्र! त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।

    18.5

    यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
    यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥5॥

    यज्ञ, दान और तप के कर्म त्यागने योग्य नहीं, वे तो करने ही चाहिए। यज्ञ, दान और तप, ये मनीषियों को पवित्र करते हैं।

    18.6

    एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
    कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥6॥

    हे पार्थ! पर इन कर्मों को भी आसक्ति और फल छोड़कर करना चाहिए, यही मेरा निश्चित और उत्तम मत है।

    18.7

    नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
    मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥7॥

    नियत कर्म का त्याग करना उचित नहीं। मोह से किया गया उसका त्याग तामसिक कहा गया है।

    18.8

    दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
    स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥8॥

    जो कर्म को 'दुखदायी है' मानकर शरीर के कष्ट के डर से छोड़ देता है, वह राजसिक त्याग करके त्याग का फल नहीं पाता।

    18.9

    कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
    सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥9॥

    हे अर्जुन! जो नियत कर्म 'यह करना ही चाहिए' मानकर, आसक्ति और फल छोड़कर किया जाता है, वही त्याग सात्त्विक माना गया है।

    18.10

    न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
    त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥10॥

    जो अप्रिय कर्म से द्वेष नहीं करता और प्रिय कर्म में आसक्त नहीं होता, वह सत्त्व से भरा, बुद्धिमान त्यागी है, जिसके संशय कट गए हैं।

    18.11

    न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
    यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥11॥

    शरीरधारी के लिए सब कर्मों को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं। पर जो कर्मफल का त्याग करता है, वही त्यागी कहलाता है।

    18.12

    अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
    भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥12॥

    त्याग न करने वालों को मरने के बाद कर्म का तीन प्रकार का फल मिलता है: अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित। पर संन्यासियों को कभी नहीं।

    18.13

    पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
    साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥13॥

    हे महाबाहो! सब कर्मों की सिद्धि के लिए सांख्य के सिद्धांत में कहे गए ये पाँच कारण मुझसे समझ।

    18.14

    अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
    विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥14॥

    अधिष्ठान, कर्ता, अलग-अलग प्रकार के करण, अनेक प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव।

    18.15

    शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
    न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥15॥

    मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरंभ करता है, चाहे न्यायसंगत हो या उल्टा, इन पाँच का ही हाथ होता है।

    18.16

    तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
    पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥16॥

    ऐसा होने पर भी जो अशुद्ध बुद्धि के कारण केवल अपने को ही कर्ता देखता है, वह दुर्मति ठीक नहीं देखता।

    18.17

    यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
    हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥17॥

    जिसका भाव अहंकार वाला नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन लोगों को मारकर भी न मारता है, न बँधता है।

    18.18

    ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
    करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥18॥

    ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता, यह तीन प्रकार की कर्म की प्रेरणा है। करण, कर्म और कर्ता, यह तीन प्रकार का कर्म का संग्रह है।

    18.19

    ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
    प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥19॥

    गुणों के भेद से ज्ञान, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकार के कहे जाते हैं। गुणों की गणना में उन्हें भी ठीक-ठीक सुन।

    18.20

    सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
    अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥20॥

    जिससे मनुष्य सब प्राणियों में एक अविनाशी भाव देखता है, बँटे हुओं में अविभक्त को देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जान।

    18.21

    पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
    वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥21॥

    पर जो ज्ञान अलगपन से सब प्राणियों में अनेक प्रकार के अलग-अलग भाव देखता है, उसे राजसिक जान।

    18.22

    यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
    अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥22॥

    और जो एक ही कार्य में इस तरह लगा है मानो वही सब कुछ हो, जो बिना कारण के है, तत्त्व के अर्थ से रहित और तुच्छ है, वह तामसिक कहा गया है।

    18.23

    नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
    अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥23॥

    जो कर्म नियत है, आसक्ति से रहित है, राग-द्वेष के बिना किया गया है, और फल की इच्छा न रखने वाले ने किया है, वह सात्त्विक कहलाता है।

    18.24

    यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
    क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥24॥

    पर जो कर्म भोग चाहने वाले ने, या अहंकार के साथ, बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजसिक कहा गया है।

    18.25

    अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
    मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥25॥

    जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना मोह से आरंभ किया जाता है, वह तामसिक कहलाता है।

    18.26

    मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
    सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥26॥

    जो आसक्ति से मुक्त है, अहंकार की बात नहीं करता, धैर्य और उत्साह से भरा है, और सफलता-असफलता में नहीं बदलता, वह कर्ता सात्त्विक कहलाता है।

    18.27

    रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
    हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥27॥

    जो रागी है, कर्मफल चाहता है, लोभी है, हिंसक स्वभाव का और अशुद्ध है, हर्ष और शोक से भरा है, वह कर्ता राजसिक कहा गया है।

    18.28

    अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
    विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥28॥

    जो अयुक्त, गँवार, अकड़ा हुआ, ठग, दूसरों की जीविका छीनने वाला, आलसी, विषादी और काम को टालने वाला है, वह कर्ता तामसिक कहलाता है।

    18.29

    बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
    प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥29॥

    हे धनंजय! गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति के भी तीन भेद हैं। उन्हें पूरी तरह और अलग-अलग कहा जा रहा है, सुन।

    18.30

    प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
    बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥30॥

    हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, करने योग्य और न करने योग्य को, भय और अभय को, तथा बंधन और मोक्ष को जानती है, वह सात्त्विकी है।

    18.31

    यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
    अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥31॥

    हे पार्थ! जिससे मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा करने योग्य और न करने योग्य को ठीक-ठीक नहीं जान पाता, वह बुद्धि राजसी है।

    18.32

    अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
    सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥32॥

    हे पार्थ! जो अंधकार से ढकी हुई अधर्म को धर्म मानती है और सब बातों को उल्टा समझती है, वह बुद्धि तामसी है।

    18.33

    धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
    योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥33॥

    हे पार्थ! जिस अटूट धृति से मनुष्य योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।

    18.34

    यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
    प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥34॥

    हे अर्जुन! पर जिस धृति से मनुष्य फल की इच्छा रखकर, आसक्ति के साथ धर्म, अर्थ और काम को धारण करता है, वह धृति राजसी है।

    18.35

    यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
    न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥35॥

    हे पार्थ! जिस धृति से दुर्बुद्धि मनुष्य नींद, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।

    18.36

    सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
    अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥36॥

    हे भरतश्रेष्ठ! अब सुख के तीन प्रकार मुझसे सुन, जिसमें अभ्यास से मनुष्य रमता है और दुख के अंत तक पहुँचता है।

    18.37

    यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
    तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥37॥

    जो आरंभ में विष जैसा और परिणाम में अमृत जैसा है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है, जो आत्मबुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है।

    18.38

    विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
    परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥38॥

    विषय और इंद्रिय के मेल से जो आरंभ में अमृत जैसा और परिणाम में विष जैसा है, वह सुख राजसिक माना गया है।

    18.39

    यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
    निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥39॥

    जो सुख आरंभ में भी और बाद में भी आत्मा को मोह में डालता है, और नींद, आलस्य तथा प्रमाद से उपजता है, वह तामसिक कहा गया है।

    18.40

    न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
    सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥40॥

    पृथ्वी पर या स्वर्ग में देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।

    18.41

    ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
    कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥41॥

    हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म उनके स्वभाव से उपजे गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं।

    18.42

    शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
    ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥42॥

    शम, दम, तप, शुद्धि, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता, ये स्वभाव से उपजे ब्राह्मण के कर्म हैं।

    18.43

    शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
    दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥43॥

    शूरता, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से न भागना, दान और स्वामीभाव, ये स्वभाव से उपजे क्षत्रिय के कर्म हैं।

    18.44

    कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
    परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥44॥

    खेती, गोरक्षा और व्यापार, ये स्वभाव से उपजे वैश्य के कर्म हैं। सेवा करना शूद्र का स्वभाव से उपजा कर्म है।

    18.45

    स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
    स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥45॥

    अपने-अपने कर्म में लगा मनुष्य सिद्धि पाता है। अपने कर्म में लगा हुआ सिद्धि कैसे पाता है, वह सुन।

    18.46

    यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
    स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥46॥

    जिससे प्राणियों की प्रवृत्ति होती है और जिससे यह सब फैला है, उसकी अपने कर्म से पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।

    18.47

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
    स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥47॥

    अच्छी तरह निभाए गए दूसरे के धर्म से अपना धर्म, चाहे कम अच्छा लगे, श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करता हुआ मनुष्य पाप नहीं पाता।

    18.48

    सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
    सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥48॥

    हे कौंतेय! स्वाभाविक कर्म दोषयुक्त हो तो भी उसे नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि सब आरंभ दोष से वैसे ही ढके हैं जैसे आग धुएँ से।

    18.49

    असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
    नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥49॥

    जिसकी बुद्धि हर जगह अनासक्त है, जिसने अपने को जीत लिया, जिसकी लालसा चली गई, वह संन्यास से परम नैष्कर्म्य सिद्धि पाता है।

    18.50

    सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
    समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥50॥

    हे कौंतेय! सिद्धि पाया हुआ मनुष्य ब्रह्म को कैसे पाता है, वह संक्षेप में मुझसे जान, जो ज्ञान की परम निष्ठा है।

    18.51

    बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
    शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥51॥

    शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्य से अपने को वश में करके, शब्द आदि विषयों को छोड़कर, राग और द्वेष को हटाकर,

    18.52

    विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
    ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥52॥

    एकांत में रहता हुआ, थोड़ा खाता हुआ, वाणी, शरीर और मन को वश में रखता हुआ, सदा ध्यानयोग में लगा हुआ और वैराग्य का आश्रय लेकर,

    18.53

    अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
    विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥53॥

    अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और संग्रह को छोड़कर, ममता से रहित और शांत होकर वह ब्रह्म होने के योग्य हो जाता है।

    18.54

    ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
    समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥54॥

    ब्रह्म बना हुआ, प्रसन्न मन वाला वह न शोक करता है, न कामना। सब प्राणियों में समान होकर वह मेरी परम भक्ति पाता है।

    18.55

    भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
    ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥55॥

    भक्ति से वह मुझे तत्त्व से जान लेता है कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ। और तत्त्व से जानकर वह तुरंत उसी में प्रवेश कर जाता है।

    18.56

    सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
    मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥56॥

    सदा सब कर्म करता हुआ भी, मेरा आश्रय लेने वाला मेरी कृपा से शाश्वत और अविनाशी पद पाता है।

    18.57

    चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
    बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥57॥

    मन से सब कर्म मुझमें अर्पित करके, मुझे परम मानकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर, सदा मुझमें चित्त वाला हो जा।

    18.58

    मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
    अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥58॥

    मुझमें चित्त रखकर तू मेरी कृपा से सब कठिनाइयों को पार कर जाएगा। और यदि तू अहंकार से नहीं सुनेगा, तो नष्ट हो जाएगा।

    18.59

    यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
    मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥59॥

    यदि अहंकार का आश्रय लेकर तू सोचता है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा', तो तेरा यह निश्चय झूठा है। तेरी प्रकृति ही तुझे लगा देगी।

    18.60

    स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
    कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥60॥

    हे कौंतेय! अपने स्वभाव से उपजे कर्म में बँधा हुआ तू मोह के कारण जो नहीं करना चाहता, वही विवश होकर करेगा।

    18.61

    ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
    भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥61॥

    हे अर्जुन! ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में बैठा है, और अपनी माया से सब प्राणियों को यंत्र पर चढ़े हुए की तरह घुमाता है।

    18.62

    तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
    तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥62॥

    हे भारत! हर भाव से उसी की शरण में जा। उसकी कृपा से तू परम शांति और शाश्वत स्थान पाएगा।

    18.63

    इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
    विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥63॥

    इस तरह गुप्त से भी गुप्त ज्ञान मैंने तुझसे कहा। इस पर पूरी तरह विचार कर, और फिर जैसा चाहे वैसा कर।

    18.64

    सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
    इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥64॥

    सबसे गुप्त मेरा परम वचन फिर सुन। तू मुझे दृढ़ता से प्रिय है, इसलिए मैं तेरे हित की बात कहूँगा।

    18.65

    मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
    मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥65॥

    मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझे नमस्कार कर। तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मुझे प्रिय है।

    18.66

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
    अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥66॥

    सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।

    पाठभेद: अहं त्वा सर्वपापेभ्यो (शंकराचार्य के पाठ में)

    18.67

    इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
    न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥67॥

    यह बात उससे कभी न कहना जो तप नहीं करता, जो भक्त नहीं है, जो सुनना नहीं चाहता, और जो मुझमें दोष निकालता है।

    18.68

    य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
    भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥68॥

    जो मुझमें परम भक्ति करके यह परम गुप्त बात मेरे भक्तों से कहेगा, वह निस्संदेह मुझे ही प्राप्त होगा।

    18.69

    न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
    भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥69॥

    मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय करने वाला कोई नहीं, और पृथ्वी पर उससे अधिक प्रिय मुझे दूसरा कोई नहीं होगा।

    18.70

    अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
    ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥70॥

    और जो हमारे इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजा गया, ऐसा मेरा मत है।

    18.71

    श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
    सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥71॥

    जो मनुष्य श्रद्धा रखते हुए और दोष न निकालते हुए इसे केवल सुन भी ले, वह भी मुक्त होकर पुण्य करने वालों के शुभ लोकों को पाएगा।

    18.72

    कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
    कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥72॥

    हे पार्थ! क्या तूने इसे एकाग्र चित्त से सुना? हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञान से उपजा मोह नष्ट हुआ?

    अर्जुन उवाच

    18.73

    नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
    स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥73॥

    अर्जुन बोले: हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ और मुझे स्मृति मिल गई। अब मैं संशय से मुक्त होकर स्थिर हूँ। मैं आपका वचन मानूँगा।

    संजय उवाच

    18.74

    इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
    संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥74॥

    संजय बोले: इस तरह मैंने वासुदेव का और महात्मा अर्जुन का यह अद्भुत और रोमांच खड़ा कर देने वाला संवाद सुना।

    18.75

    व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
    योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥75॥

    व्यास की कृपा से मैंने यह परम गुप्त योग सुना, जिसे योगेश्वर कृष्ण ने स्वयं साक्षात् कहा।

    18.76

    राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
    केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥76॥

    हे राजन्! केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।

    18.77

    तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
    विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥77॥

    हे राजन्! हरि के उस अत्यंत अद्भुत रूप को बार-बार याद करके मुझे बड़ा विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।

    18.78

    यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
    तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥78॥

    जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर पार्थ है, वहीं श्री, विजय, ऐश्वर्य और अटल नीति है, यह मेरा मत है।

    संस्कृत पाठ तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर जाँचा गया है। अर्थ किसी प्रकाशित अनुवाद से नहीं लिया गया, संस्कृत से सीधे सरल भाषा में लिखा गया है।

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    सामान्य प्रश्न

    भगवद्गीता के अध्याय 18 में कितने श्लोक हैं?

    अध्याय 18 "मोक्ष संन्यास योग" में 78 श्लोक हैं।

    गीता का अध्याय 18 किस विषय में है?

    सबसे लंबा अध्याय, और काफी हद तक सारांश। संन्यास और त्याग का अंतर, कर्म के पाँच कारण, और फिर ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख, हर एक के तीन-तीन रूप। स्वभाव के अनुसार काम के बँटवारे की बात भी यहीं है, और वह पंक्ति दोहराई जाती है कि दूसरे का धर्म अच्छी तरह निभाने से अपना धर्म अधूरा निभाना बेहतर है। अंत में वह श्लोक आता है जिसे बहुत लोग पूरी गीता का निचोड़ मानते हैं: सब छोड़कर मेरी शरण में आ जा। फिर कृष्ण एक बात कहते हैं जो कम ध्यान में आती है: सोच-विचार कर लो, और फिर जैसा चाहो वैसा करो। अर्जुन कहते हैं मोह गया, और खड़े हो जाते हैं।