
ललिता सहस्रनाम
Lalita Sahasranama
॥ ध्यानम् ॥ सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिणयनां माणिक्यमौलिस्फुर- त्तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्। पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम्॥ ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री माता श्री महाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी। चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता॥ उद्यद्भानुसहस्राभा चतुर्बाहुसमन्विता। रागस्वरूपपाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥ मनोरूपेक्षुकोदण्डा पञ्चतन्मात्रसायका। निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला॥ चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा। कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता॥ [श्री ललिता सहस्रनाम ब्रह्माण्ड पुराण के अंतर्गत आता है और इसमें देवी ललिता (त्रिपुरसुन्दरी) के 1000 पवित्र नाम 182 श्लोकों में सम्मिलित हैं। स्थान की सीमा के कारण यहाँ ध्यान श्लोक और आरंभिक नाम प्रस्तुत किए गए हैं — सम्पूर्ण एवं प्रामाणिक पाठ हेतु कृपया किसी विश्वसनीय प्रकाशित संस्करण का संदर्भ लें।] ॥ फलश्रुति ॥ य इदं परमं गुह्यं शृणुयाद् भक्तिसंयुतः। सर्वान् कामानवाप्नोति महात्रिपुरसुन्दरीम्॥
अर्थ
ललिता सहस्रनाम ब्रह्माण्ड पुराण के अंतर्गत वशिनी आदि वाग्देवताओं द्वारा उपदेशित देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी के एक हज़ार नामों का संग्रह है। यह शाक्त सम्प्रदाय और श्रीविद्या उपासना में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जिसमें देवी को सृष्टि की परम शक्ति, सौंदर्य और करुणा के रूप में वर्णित किया गया है।
लाभ
- 🪷देवी की कृपा, सौभाग्य और आंतरिक शक्ति प्राप्ति हेतु पाठ किया जाता है
- 🪷मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन में सहायक माना जाता है
- 🪷ललिता जयंती और नवरात्रि में विशेष रूप से पढ़ा जाता है
- 🪷श्रीविद्या और शाक्त उपासकों में अत्यंत प्रिय स्तोत्र है
जप/पाठ विधि
प्रातःकाल स्नान के बाद देवी के चित्र के समक्ष दीपक जलाकर श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ पूर्ण पाठ करें। परंपरागत रूप से इसे गुरु मार्गदर्शन में सीखना उत्तम माना जाता है।
सर्वोत्तम समय
ललिता जयंती, नवरात्रि तथा प्रातःकाल विशेष शुभ माने जाते हैं।