
गणेश स्तोत्र
Ganesh Stotram
श्री गणेश की सभी सामग्री देखें →प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्। भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थसिद्धये॥ प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्। तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥ लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च। सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥ नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्। एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥ द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः। न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥
अर्थ
यह गणेश जी के बारह पवित्र नामों का स्तोत्र है — वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति और गजानन। मान्यता है कि जो इन बारह नामों का त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) पाठ करता है, उसे विघ्नों का भय नहीं रहता और सभी कार्य सिद्ध होते हैं।
लाभ
- 🪷नए कार्य या यात्रा आरंभ करने से पहले पाठ करना शुभ माना जाता है
- 🪷विघ्नों और बाधाओं को दूर करने में सहायक
- 🪷एकाग्रता और आत्मविश्वास बढ़ाता है
- 🪷गणेश चतुर्थी पर विशेष रूप से पढ़ा जाता है
जप/पाठ विधि
गणेश जी की मूर्ति के सामने दीपक जलाकर, त्रिकाल (प्रातः, दोपहर, सायं) में से किसी भी समय शांत मन से पाठ करें। किसी भी नए कार्य के आरंभ में इसे पढ़ना शुभ माना जाता है।
सर्वोत्तम समय
बुधवार और गणेश चतुर्थी विशेष शुभ मानी जाती है; अन्यथा किसी भी दिन प्रातःकाल उपयुक्त है।
FAQ
किसी भी नया कार्य, यात्रा या पूजा आरंभ करने से पहले इसे पढ़ना शुभ माना जाता है।