स्तोत्र
    Gajendra Moksha Stotram

    गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

    Gajendra Moksha Stotram

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    श्रीशुक उवाच —
    एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि।
    जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्॥
    
    गजेन्द्र उवाच —
    ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्।
    पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥
    
    यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम्।
    योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम्॥
    
    यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
    क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम्।
    अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते
    स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः॥
    
    कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो
    लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु।
    तमस्तदासीद्गहनं गभीरं
    यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः॥
    
    न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुर्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम्।
    यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
    दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥
    
    स त्वं ममाप्यच्युत तत्त्वकोविदैर्ज्ञानागमैरीश्वरसन्धिमर्ग्यते।
    यद्यच्छरणं लभते विमुक्तये
    तद्गच्छतां मां सकलं नमस्ते॥
    
    अजायमानाय हिरण्यगर्भाय
    परात्मने निर्वृतगुणात्मने नमः।
    नारायणायामलकारणाय
    नमोऽस्तु तस्मै भगवन्निधानाय॥
    
    यः सर्वभूतात्मदृगात्मदर्शनो
    ज्ञानात्मकः सत्त्वरजस्तमोमयः।
    मायामयो योऽनुगुणो विभाव्यते
    तस्मै नमस्ते परमेश्वराय॥
    
    नमः शिवाय शांताय सत्त्वाय प्रमहात्मने।
    पराय कारणायैव पुरुषाय नमो नमः॥
    
    नमो नमस्तेऽखिलकारणाय
    निष्कारणायाद्भुतकारणाय।
    सर्वागमाम्नायमहर्णवाय
    नारायणायाद्भुतशक्तये नमः॥
    
    नमस्तेऽनन्ताय सहस्रमूर्तये
    सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे।
    सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
    सहस्रकोट्युग्रविक्रमाय नमः॥
    
    यः स्मृत्या च श्रवणेन भक्त्या
    ध्यानाच्च कीर्तनाद्भगवतः सुधीः।
    न पश्यति व्यसनमस्य जन्तो
    दुरत्ययं तीव्रतमं तमोऽन्धम्॥
    
    एवं स्तुतः स भगवान् अनादिरव्ययः।
    प्रसन्नहासोऽरुणलोचनः प्रभुः।
    करेण गृहीत्वा गजेन्द्रमंबुजात्
    समुद्धृतो मुक्त इव द्विजाधिपः॥

    अर्थ

    यह स्तोत्र श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कन्ध) की प्रसिद्ध गजेन्द्र मोक्ष कथा से है। जब ग्राह (मगरमच्छ) ने गजराज का पैर पकड़ लिया और सारे बल-प्रयास असफल हो गए, तब गजेन्द्र ने पूर्वजन्म में सीखी इस स्तुति से भगवान विष्णु को पुकारा। इसमें गजेन्द्र भगवान को सृष्टि के आदि कारण, सर्वव्यापी, समय और मृत्यु से परे परमेश्वर के रूप में नमन करता है। स्तुति सुनकर भगवान गरुड़ पर बिना विलंब दौड़े आए और गजेन्द्र को ग्राह से मुक्त किया।

    लाभ

    • 🪷पूर्ण समर्पण और शरणागति भाव का प्रतीक माना जाता है
    • 🪷संकट के समय पाठ करने से मानसिक बल मिलता है
    • 🪷ईश्वर पर अटूट विश्वास को दृढ़ करता है
    • 🪷भागवत कथा और सत्संग में इसका विशेष महत्व है

    जप/पाठ विधि

    शांत मन से, विशेषकर संकट या भय के समय, श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करें। भगवान विष्णु के चित्र या मूर्ति के समक्ष दीपक जलाकर पाठ करना उत्तम माना जाता है।

    सर्वोत्तम समय

    किसी भी समय पढ़ा जा सकता है; संकट या कठिनाई के समय विशेष रूप से इसका स्मरण किया जाता है।

    FAQ

    यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कन्ध में वर्णित है।

    इसकी मुख्य शिक्षा है कि सच्चे और सम्पूर्ण समर्पण से भगवान अपने भक्त की रक्षा करने तुरंत आते हैं, चाहे भक्त का बल कितना भी कम क्यों न हो।