4 मार्च
होली
रंगों और प्रेम का पर्व
इतिहास
होली की कथा भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की बहन होलिका से जुड़ी है। हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को, जो भगवान विष्णु का परम भक्त था, मारने के लिए होलिका को अग्नि में साथ बैठने को कहा — होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। परंतु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहा और होलिका जल गई। इसी की स्मृति में होली से एक रात पहले "होलिका दहन" किया जाता है, और अगले दिन रंगों के साथ होली खेली जाती है, जो भगवान कृष्ण और राधा की प्रेम-क्रीड़ाओं से भी जुड़ी है।
महत्व
होली असत्य पर सत्य, और अहंकार पर भक्ति की विजय का प्रतीक है। यह पर्व सामाजिक भेदभाव मिटाकर सभी को रंगों के माध्यम से एकता और आनंद में बांधता है।
पूजा विधि
होली से एक रात पहले होलिका दहन स्थल पर लकड़ी और उपले इकट्ठा कर, शुभ मुहूर्त में अग्नि प्रज्वलित करें और परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करें। अगले दिन प्रातः परिवार और मित्रों के साथ रंग, गुलाल और पानी से होली खेलें, और मिठाइयों का आदान-प्रदान करें।
मुहूर्त
होलिका दहन पूर्णिमा तिथि की प्रदोष काल में, भद्रा रहित समय में करना शुभ माना जाता है। सटीक समय हेतु हमारा पंचांग पेज देखें।
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