4 सितंबर
कृष्ण जन्माष्टमी
भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव
श्री कृष्ण की सभी सामग्री देखें →इतिहास
जन्माष्टमी भाद्रपद मास की कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है, जिस दिन मथुरा के कारागार में देवकी और वासुदेव के आठवें पुत्र के रूप में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। अत्याचारी मामा कंस से बचाने के लिए वासुदेव जी उसी रात्रि कृष्ण को यमुना पार कराकर गोकुल में नंद-यशोदा के घर छोड़ आए, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ।
महत्व
जन्माष्टमी धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए भगवान के अवतरण का उत्सव है। भक्तगण रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और उपवास कर मध्यरात्रि (जन्म के क्षण) पर विशेष पूजा करते हैं।
पूजा विधि
दिनभर व्रत रखें। संध्या समय कृष्ण जी की मूर्ति को झूले में सजाएं। मध्यरात्रि को बाल कृष्ण का पंचामृत से अभिषेक कर नए वस्त्र और आभूषण पहनाएं, और आरती कर भोग अर्पित करें। मंदिरों में रासलीला और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है।
मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
Om Namo Bhagavate Vasudevaya॥
यह द्वादशाक्षर मंत्र भगवान विष्णु/कृष्ण को समर्पित है और भक्ति व शरणागति का प्रतीक है।
मुहूर्त
मुख्य पूजा अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि (रोहिणी नक्षत्र के योग में विशेष शुभ) में की जाती है। सटीक समय हेतु पंचांग देखें।
आज का पंचांग देखें →क्या करें व क्या न करें
✅ क्या करें
- • मध्यरात्रि पूजा के लिए जागरण करें
- • बाल कृष्ण को झूले में झुलाएं
- • पंचामृत का भोग व प्रसाद वितरण करें
- • भजन-कीर्तन और रासलीला में भाग लें
❌ क्या न करें
- • मध्यरात्रि पूजा से पहले भोजन न करें (यदि व्रत रखा हो)
- • बाल कृष्ण की मूर्ति को अशुद्ध हाथों से न छुएं
- • पूजा स्थल पर अव्यवस्था न रखें
- • व्रत के दौरान अनाज का सेवन न करें