अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥1॥
अर्जुन बोले: हे केशव! प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और ज्ञेय, यह सब मैं जानना चाहता हूँ।
अध्याय 13 · 34 श्लोक
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
यह अध्याय एक सीधी तस्वीर से शुरू होता है: शरीर खेत है, और जो उसे जानता है वह खेत का जानने वाला। फिर गिनाया जाता है कि उस खेत में क्या-क्या है, पाँच तत्त्वों से लेकर इच्छा, द्वेष, सुख और दुख तक। बीच में ज्ञान की एक सूची है जो पढ़ने में सरल लगती है पर करने में कठिन: अपने को बड़ा न मानना, दिखावा न करना, गुरु की सेवा, एकांत, और प्रिय-अप्रिय दोनों में एक सा रहना। अंत में वह उपमा आती है जो पूरी बात समेट लेती है: जैसे एक सूरज सारे जगत् को रोशन करता है, वैसे ही खेत का मालिक पूरे खेत को।
शरीर खेत है, तू उसका जानने वाला। दोनों को अलग-अलग देख लेना ही शुरुआत है।
अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥1॥
अर्जुन बोले: हे केशव! प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और ज्ञेय, यह सब मैं जानना चाहता हूँ।
श्रीभगवान उवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥2॥
श्रीभगवान बोले: हे कौंतेय! यह शरीर क्षेत्र कहलाता है, और जो इसे जानता है उसे जानने वाले क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥3॥
हे भारत! सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥4॥
वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, किन विकारों वाला है, किससे हुआ है; और वह क्षेत्रज्ञ कौन है, किस प्रभाव वाला है; यह सब मुझसे संक्षेप में सुन।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥5॥
ऋषियों ने इसे अनेक प्रकार से, अलग-अलग छंदों में गाया है, और ब्रह्मसूत्र के तर्कसंगत तथा निश्चित पदों में भी यह कहा गया है।
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥6॥
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त, दस इंद्रियाँ और एक मन, तथा इंद्रियों के पाँच विषय;
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥7॥
इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, शरीर का संघात, चेतना और धृति: यही विकारों सहित क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥8॥
अपने को बड़ा न मानना, दिखावा न करना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम;
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥9॥
इंद्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे, रोग तथा दुख के दोषों को बार-बार देखना;
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥10॥
आसक्ति का न होना, पुत्र, स्त्री और घर आदि में लिपटे न रहना, और प्रिय-अप्रिय के आने पर सदा समान चित्त रहना;
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥11॥
मुझमें अनन्य योग से अटूट भक्ति, एकांत जगह में रहना, और लोगों की भीड़ में मन न लगना;
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥12॥
अध्यात्मज्ञान में सदा रहना और तत्त्वज्ञान के अर्थ को देखना: यह ज्ञान कहा गया है। इससे उल्टा जो है, वह अज्ञान है।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥13॥
जो जानने योग्य है, उसे मैं कहूँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमृत पाता है। वह अनादि परम ब्रह्म है, जिसे न सत् कहा जाता है, न असत्।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥14॥
उसके हाथ और पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं। वह संसार में सबको ढककर स्थित है।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥15॥
वह सब इंद्रियों के गुणों से प्रतीत होता है, फिर भी सब इंद्रियों से रहित है। वह अनासक्त है, फिर भी सबको धारण करता है; निर्गुण है, फिर भी गुणों को भोगता है।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥16॥
वह प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी, अचर भी है और चर भी। सूक्ष्म होने से वह जाना नहीं जाता। वह दूर भी है और पास भी।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥17॥
वह प्राणियों में बँटा हुआ न होकर भी बँटा हुआ सा स्थित है। जानने योग्य वह प्राणियों को धारण करने वाला, निगलने वाला और उत्पन्न करने वाला है।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥18॥
वह ज्योतियों की भी ज्योति है और अंधकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान है, ज्ञेय है, ज्ञान से पाने योग्य है, और सबके हृदय में बैठा है।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥19॥
इस तरह क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय संक्षेप में कहे गए। मेरा भक्त इसे ठीक से जानकर मेरे भाव के योग्य हो जाता है।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥20॥
प्रकृति और पुरुष, दोनों को ही अनादि जान। विकारों और गुणों को प्रकृति से उत्पन्न जान।
पाठभेद: कार्यकरणकर्तृत्वे (शंकराचार्य के पाठ में)
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥21॥
कार्य, करण और कर्तापन में प्रकृति कारण कही जाती है, और सुख-दुख के भोग में पुरुष कारण कहा जाता है।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥22॥
प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उपजे गुणों को भोगता है। गुणों में उसकी आसक्ति ही उसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म का कारण है।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥23॥
इस शरीर में जो परम पुरुष है, उसे साक्षी, अनुमति देने वाला, भरण करने वाला, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा भी कहा गया है।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥24॥
जो पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को इस तरह जान लेता है, वह चाहे जैसे भी रहे, फिर जन्म नहीं लेता।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥25॥
कुछ लोग ध्यान से आत्मा में आत्मा को आत्मा से देखते हैं, कुछ सांख्ययोग से और कुछ कर्मयोग से।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥26॥
पर कुछ इस तरह न जानते हुए भी दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं। सुनने में लगे वे लोग भी मृत्यु को पार कर जाते हैं।
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥27॥
हे भरतश्रेष्ठ! जो भी चर या अचर प्राणी उत्पन्न होता है, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से हुआ जान।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥28॥
जो सब प्राणियों में समान रूप से स्थित परमेश्वर को, नाश होते हुओं में अविनाशी को देखता है, वही देखता है।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥29॥
सब जगह समान रूप से स्थित ईश्वर को समान देखता हुआ वह अपने से अपनी हिंसा नहीं करता, और इसलिए परम गति को पाता है।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥30॥
जो देखता है कि सब कर्म प्रकृति से ही किए जा रहे हैं, और आत्मा अकर्ता है, वही देखता है।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥31॥
जब वह प्राणियों के अलग-अलग भाव को एक में टिका हुआ देखता है, और उसी से उनका विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥32॥
हे कौंतेय! अनादि और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में रहकर भी न कुछ करता है, न लिप्त होता है।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥33॥
जैसे सब जगह फैला आकाश सूक्ष्म होने से लिप्त नहीं होता, वैसे ही सारे शरीर में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥34॥
हे भारत! जैसे एक सूर्य इस सारे लोक को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्री सारे क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥35॥
जो ज्ञान की आँख से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के इस भेद को जानते हैं, और प्राणियों की प्रकृति से छूटना जानते हैं, वे परम को प्राप्त होते हैं।
संस्कृत पाठ तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर जाँचा गया है। अर्थ किसी प्रकाशित अनुवाद से नहीं लिया गया, संस्कृत से सीधे सरल भाषा में लिखा गया है।
श्री कृष्ण की सभी सामग्री देखें →भगवद्गीता के अध्याय 13 में कितने श्लोक हैं?
अध्याय 13 "क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग" में 34 श्लोक हैं।
गीता का अध्याय 13 किस विषय में है?
यह अध्याय एक सीधी तस्वीर से शुरू होता है: शरीर खेत है, और जो उसे जानता है वह खेत का जानने वाला। फिर गिनाया जाता है कि उस खेत में क्या-क्या है, पाँच तत्त्वों से लेकर इच्छा, द्वेष, सुख और दुख तक। बीच में ज्ञान की एक सूची है जो पढ़ने में सरल लगती है पर करने में कठिन: अपने को बड़ा न मानना, दिखावा न करना, गुरु की सेवा, एकांत, और प्रिय-अप्रिय दोनों में एक सा रहना। अंत में वह उपमा आती है जो पूरी बात समेट लेती है: जैसे एक सूरज सारे जगत् को रोशन करता है, वैसे ही खेत का मालिक पूरे खेत को।