सभी अध्याय

    अध्याय 15 · 20 श्लोक

    पुरुषोत्तम योग

    पुरुषोत्तमयोग

    इस अध्याय में

    अध्याय एक उलटे पेड़ की तस्वीर से खुलता है, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे। कृष्ण कहते हैं इसे असंग की कुल्हाड़ी से काटो। फिर वे जीव की बात करते हैं जो शरीर बदलते समय इंद्रियों को साथ ले जाता है, जैसे हवा फूलों से गंध ले जाती है। अंत में वह बँटवारा आता है जिससे अध्याय का नाम पड़ा: क्षर, अक्षर, और इन दोनों से ऊपर पुरुषोत्तम। यह छोटा अध्याय बहुत घरों में भोजन से पहले पढ़ा जाता है।

    मुख्य बात

    एक उलटा पेड़, जिसे काटना है। और उसके पार वह जो न मिटने वाले से भी ऊपर है।

    श्लोक

    श्रीभगवान उवाच

    15.1

    ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
    छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥1॥

    श्रीभगवान बोले: ऊपर मूल वाले, नीचे शाखाओं वाले उस अश्वत्थ को अविनाशी कहते हैं, जिसके पत्ते छंद हैं। जो उसे जानता है, वही वेद जानने वाला है।

    15.2

    अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
    गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
    अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
    कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥2॥

    उसकी शाखाएँ गुणों से बढ़ी हुई और विषयों की कोंपलों वाली, नीचे और ऊपर दोनों ओर फैली हैं। और मनुष्यलोक में कर्म से बाँधने वाली उसकी जड़ें नीचे की ओर फैली हुई हैं।

    15.3

    न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
    नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
    अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम्
    असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥3॥

    इसका रूप यहाँ वैसा नहीं मिलता, न इसका अंत है, न आदि, न आधार। इस दृढ़ मूल वाले अश्वत्थ को असंगरूपी मज़बूत शस्त्र से काटकर,

    15.4

    ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
    यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
    तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये ।
    यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥4॥

    फिर उस पद को खोजना चाहिए जहाँ पहुँचकर लोग लौटते नहीं। 'जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति फैली है, उसी आदि पुरुष की मैं शरण लेता हूँ' ऐसा सोचकर।

    15.5

    निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
    अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
    द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥5॥

    जो मान और मोह से रहित हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया, जो सदा अध्यात्म में हैं, जिनकी कामनाएँ शांत हो गईं, जो सुख-दुख नाम के द्वंद्वों से छूट गए, वे मोहरहित लोग उस अविनाशी पद को पाते हैं।

    15.6

    न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
    यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥6॥

    उसे न सूर्य प्रकाशित करता है, न चंद्रमा, न अग्नि। जहाँ जाकर लोग लौटते नहीं, वही मेरा परम धाम है।

    15.7

    ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
    मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥7॥

    इस जीवलोक में मेरा ही सनातन अंश जीव बनकर, प्रकृति में स्थित मन सहित छह इंद्रियों को खींचता है।

    15.8

    शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
    गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥8॥

    जब ईश्वर शरीर पाता है और जब उसे छोड़कर जाता है, तब इन्हें लेकर वैसे ही जाता है जैसे वायु फूलों से गंध ले जाती है।

    15.9

    श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
    अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥9॥

    कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक का तथा मन का आश्रय लेकर यह विषयों का सेवन करता है।

    15.10

    उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
    विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥10॥

    शरीर छोड़ते हुए, उसमें रहते हुए, या गुणों के साथ भोगते हुए भी, मूढ़ लोग उसे नहीं देख पाते। ज्ञान की आँख वाले देख लेते हैं।

    15.11

    यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
    यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥11॥

    प्रयत्न करने वाले योगी उसे अपने भीतर स्थित देख लेते हैं। पर जिनका अंतःकरण शुद्ध नहीं, वे विवेकहीन लोग प्रयत्न करके भी उसे नहीं देख पाते।

    15.12

    यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
    यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥12॥

    सूर्य में जो तेज सारे जगत् को प्रकाशित करता है, और जो चंद्रमा में है और अग्नि में है, उस तेज को मेरा जान।

    15.13

    गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
    पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥13॥

    पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति से प्राणियों को धारण करता हूँ, और रसमय सोम बनकर सब औषधियों को पुष्ट करता हूँ।

    15.14

    अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
    प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥14॥

    मैं वैश्वानर अग्नि बनकर प्राणियों के शरीर में रहकर, प्राण और अपान से मिलकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

    15.15

    सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
    मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च ।
    वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
    वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥15॥

    मैं सबके हृदय में बैठा हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और इनका जाना होता है। सब वेदों से जानने योग्य मैं ही हूँ, वेदांत का कर्ता और वेद जानने वाला भी मैं हूँ।

    15.16

    द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
    क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥16॥

    इस लोक में दो पुरुष हैं: क्षर और अक्षर। सब प्राणी क्षर हैं, और कूटस्थ अक्षर कहलाता है।

    15.17

    उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
    यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥17॥

    पर उत्तम पुरुष इनसे अलग है, जिसे परमात्मा कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उन्हें धारण करता है।

    15.18

    यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
    अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥18॥

    क्योंकि मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में मैं पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।

    15.19

    यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
    स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥19॥

    हे भारत! जो मोहरहित होकर मुझे इस तरह पुरुषोत्तम जानता है, वह सब जानने वाला हर भाव से मुझे भजता है।

    15.20

    इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
    एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥20॥

    हे निष्पाप! यह सबसे गुप्त शास्त्र मैंने कहा। हे भारत! इसे समझकर मनुष्य बुद्धिमान हो जाता है और उसका करने योग्य पूरा हो जाता है।

    संस्कृत पाठ तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर जाँचा गया है। अर्थ किसी प्रकाशित अनुवाद से नहीं लिया गया, संस्कृत से सीधे सरल भाषा में लिखा गया है।

    श्री कृष्ण की सभी सामग्री देखें →

    सामान्य प्रश्न

    भगवद्गीता के अध्याय 15 में कितने श्लोक हैं?

    अध्याय 15 "पुरुषोत्तम योग" में 20 श्लोक हैं।

    गीता का अध्याय 15 किस विषय में है?

    अध्याय एक उलटे पेड़ की तस्वीर से खुलता है, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे। कृष्ण कहते हैं इसे असंग की कुल्हाड़ी से काटो। फिर वे जीव की बात करते हैं जो शरीर बदलते समय इंद्रियों को साथ ले जाता है, जैसे हवा फूलों से गंध ले जाती है। अंत में वह बँटवारा आता है जिससे अध्याय का नाम पड़ा: क्षर, अक्षर, और इन दोनों से ऊपर पुरुषोत्तम। यह छोटा अध्याय बहुत घरों में भोजन से पहले पढ़ा जाता है।