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    अध्याय 16 · 24 श्लोक

    दैवासुर संपद् विभाग योग

    दैवासुरसम्पद्विभागयोग

    इस अध्याय में

    अध्याय दो सूचियों से शुरू होता है। पहली में निर्भयता, अहिंसा, सत्य, दान, क्षमा, कोमलता जैसी छब्बीस बातें हैं। दूसरी छोटी है: दिखावा, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता, अज्ञान। इसके बाद कृष्ण दूसरी तरह के आदमी की भीतर की आवाज़ सुनाते हैं, और वह आज भी पहचानी जाती है: यह मैंने पा लिया, वह भी पा लूँगा, वह शत्रु मार डाला, बाकी भी मारूँगा, मेरे बराबर कौन है। अध्याय उस एक वाक्य पर आकर टिकता है जो लोग सबसे अधिक याद रखते हैं: काम, क्रोध और लोभ, नरक के तीन दरवाज़े।

    मुख्य बात

    काम, क्रोध और लोभ, नरक के तीन दरवाज़े। इतना ही याद रह जाए तो बहुत है।

    श्लोक

    श्रीभगवान उवाच

    16.1

    अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
    दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥1॥

    श्रीभगवान बोले: निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, इंद्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता;

    16.2

    अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
    दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥2॥

    अहिंसा, सत्य, क्रोध का न होना, त्याग, शांति, चुगली न करना, प्राणियों पर दया, लोभ का न होना, कोमलता, लज्जा और चंचलता का न होना;

    16.3

    तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
    भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥3॥

    तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्रोह का न होना और अपने को बहुत बड़ा न मानना: हे भारत! ये दैवी संपत्ति में जन्मे व्यक्ति के लक्षण हैं।

    16.4

    दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
    अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥4॥

    हे पार्थ! दिखावा, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान, ये आसुरी संपत्ति में जन्मे व्यक्ति के लक्षण हैं।

    16.5

    दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
    मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥5॥

    दैवी संपत्ति मोक्ष के लिए और आसुरी बंधन के लिए मानी गई है। हे पांडव! शोक मत कर, तू दैवी संपत्ति में जन्मा है।

    16.6

    द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
    दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥6॥

    इस लोक में प्राणियों की दो प्रकार की सृष्टि है: दैवी और आसुरी। दैवी विस्तार से कही गई। हे पार्थ! अब आसुरी मुझसे सुन।

    16.7

    प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
    न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥7॥

    आसुरी स्वभाव वाले लोग न यह जानते हैं कि क्या करना चाहिए, न यह कि क्या नहीं। उनमें न शुद्धि होती है, न आचार, न सत्य।

    16.8

    असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
    अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥8॥

    वे कहते हैं कि जगत् असत्य है, इसका कोई आधार नहीं, कोई ईश्वर नहीं, यह बिना किसी क्रम के बना है, और काम के सिवा इसका और क्या कारण है।

    16.9

    एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
    प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥9॥

    इस दृष्टि को पकड़कर, नष्ट बुद्धि वाले और अल्पबुद्धि वे लोग उग्र कर्म करते हुए जगत् के नाश के लिए, उसके अहित में लगे रहते हैं।

    16.10

    काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
    मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥10॥

    कभी न भरने वाली कामना का आश्रय लेकर, दिखावे, मान और मद से भरे, मोह से गलत बातें पकड़कर, वे अशुद्ध व्रत लेकर चलते हैं।

    16.11

    चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
    कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥11॥

    मरण तक रहने वाली अपार चिंता में डूबे, भोग को ही परम मानने वाले, वे यही मान बैठते हैं कि बस इतना ही है।

    16.12

    आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
    ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥12॥

    आशा के सैकड़ों बंधनों में बँधे, काम और क्रोध में लगे वे भोग के लिए अन्याय से धन जोड़ने की चेष्टा करते हैं।

    16.13

    इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
    इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥13॥

    यह मैंने आज पा लिया, यह मनोरथ भी पूरा करूँगा; यह मेरे पास है, यह धन भी मेरा हो जाएगा।

    16.14

    असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
    ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥14॥

    वह शत्रु मैंने मार डाला, दूसरों को भी मारूँगा; मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान हूँ, सुखी हूँ।

    16.15

    आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
    यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥15॥

    मैं धनी हूँ, बड़े कुल का हूँ; मेरे बराबर और कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनंद करूँगा। इस तरह वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।

    16.16

    अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
    प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥16॥

    अनेक विचारों से भटके, मोह के जाल में घिरे, भोगों में आसक्त वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।

    16.17

    आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
    यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥17॥

    अपने को ही बड़ा मानने वाले, अकड़े हुए, धन और मान के मद से भरे वे लोग दिखावे के लिए, विधि के बिना, नाममात्र के यज्ञ करते हैं।

    16.18

    अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
    मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥18॥

    अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे दोष निकालने वाले लोग अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझसे द्वेष करते हैं।

    16.19

    तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
    क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥19॥

    उन द्वेष करने वाले क्रूर नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ, जो अशुभ हैं।

    16.20

    आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
    मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥20॥

    हे कौंतेय! आसुरी योनि पाकर वे मूढ़ जन्म-जन्म में मुझे न पाकर उससे भी नीची गति को जाते हैं।

    16.21

    त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
    कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥21॥

    काम, क्रोध और लोभ, ये नरक के तीन द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।

    16.22

    एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
    आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥22॥

    हे कौंतेय! अंधकार के इन तीनों द्वारों से छूटा हुआ मनुष्य अपने कल्याण का आचरण करता है और इसलिए परम गति को जाता है।

    16.23

    यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
    न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥23॥

    जो शास्त्र की विधि छोड़कर अपनी इच्छा से चलता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति।

    16.24

    तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
    ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥24॥

    इसलिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसे तय करने में शास्त्र ही तेरा प्रमाण हो। शास्त्र की विधि में कहा हुआ जानकर तुझे यहाँ कर्म करना चाहिए।

    संस्कृत पाठ तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर जाँचा गया है। अर्थ किसी प्रकाशित अनुवाद से नहीं लिया गया, संस्कृत से सीधे सरल भाषा में लिखा गया है।

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    सामान्य प्रश्न

    भगवद्गीता के अध्याय 16 में कितने श्लोक हैं?

    अध्याय 16 "दैवासुर संपद् विभाग योग" में 24 श्लोक हैं।

    गीता का अध्याय 16 किस विषय में है?

    अध्याय दो सूचियों से शुरू होता है। पहली में निर्भयता, अहिंसा, सत्य, दान, क्षमा, कोमलता जैसी छब्बीस बातें हैं। दूसरी छोटी है: दिखावा, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता, अज्ञान। इसके बाद कृष्ण दूसरी तरह के आदमी की भीतर की आवाज़ सुनाते हैं, और वह आज भी पहचानी जाती है: यह मैंने पा लिया, वह भी पा लूँगा, वह शत्रु मार डाला, बाकी भी मारूँगा, मेरे बराबर कौन है। अध्याय उस एक वाक्य पर आकर टिकता है जो लोग सबसे अधिक याद रखते हैं: काम, क्रोध और लोभ, नरक के तीन दरवाज़े।