श्रीभगवान उवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥1॥
श्रीभगवान बोले: मैंने यह अविनाशी योग विवस्वान् से कहा था, विवस्वान् ने मनु से कहा, और मनु ने इक्ष्वाकु से।
अध्याय 4 · 42 श्लोक
ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
कृष्ण बताते हैं कि यह उपदेश नया नहीं है, यह परंपरा से चला आया और बीच में लुप्त हो गया। अर्जुन का सवाल स्वाभाविक है: आपका जन्म तो अभी हुआ, आपने यह पहले कैसे कहा? इसी से अवतार की बात निकलती है, और वे दो श्लोक आते हैं जो आज भी सबसे अधिक उद्धृत होते हैं: जब-जब धर्म घटता है, तब-तब मैं आता हूँ। बाकी अध्याय इस पेचीदा सवाल पर है कि कर्म क्या है और अकर्म क्या, और यह कि ज्ञान की आग कर्म के बंधन को कैसे जला देती है। अंत में गुरु के पास कैसे जाएँ, यह भी बताया गया है: झुककर, पूछकर, सेवा करके।
धर्म घटता है तो ईश्वर आता है। और जानने की आग कर्म के बंधन को जला देती है।
श्रीभगवान उवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥1॥
श्रीभगवान बोले: मैंने यह अविनाशी योग विवस्वान् से कहा था, विवस्वान् ने मनु से कहा, और मनु ने इक्ष्वाकु से।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥2॥
इस तरह परंपरा से चला आया यह योग राजर्षियों ने जाना। हे परंतप! बहुत समय बीतने पर वह योग यहाँ लुप्त हो गया।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥3॥
वही पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है, क्योंकि तू मेरा भक्त और सखा है। यह उत्तम रहस्य है।
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥4॥
अर्जुन बोले: आपका जन्म तो बाद का है और विवस्वान् का पहले का। फिर मैं यह कैसे समझूँ कि आपने आरंभ में यह कहा था?
श्रीभगवान उवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥5॥
श्रीभगवान बोले: हे अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म बीत चुके हैं। हे परंतप! मैं उन सबको जानता हूँ, तू नहीं जानता।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥6॥
अजन्मा और अविनाशी होकर भी, सब प्राणियों का ईश्वर होकर भी, मैं अपनी प्रकृति में स्थित होकर अपनी माया से प्रकट होता हूँ।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥7॥
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को रचता हूँ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥8॥
सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्कर्म करने वालों के नाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥9॥
हे अर्जुन! जो मेरे दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर छोड़ने पर फिर जन्म नहीं लेता, मुझे ही प्राप्त होता है।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥10॥
राग, भय और क्रोध से छूटकर, मुझमें ही लीन होकर, मेरा आश्रय लेकर, ज्ञान-तप से पवित्र हुए बहुत से लोग मेरे भाव को प्राप्त हुए हैं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥11॥
जो जिस भाव से मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी तरह अपनाता हूँ। हे पार्थ! मनुष्य हर तरह से मेरे ही मार्ग पर चलते हैं।
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥12॥
कर्मों की सिद्धि चाहने वाले यहाँ देवताओं को पूजते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्म से मिलने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥13॥
गुण और कर्म के विभाग से चारों वर्ण मैंने रचे। उसका कर्ता होकर भी मुझे अकर्ता और अविनाशी जान।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥14॥
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, और न मुझे कर्मफल की चाह है। जो मुझे ऐसा जानता है, वह कर्मों से नहीं बँधता।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥15॥
पहले के मुमुक्षुओं ने भी यह जानकर कर्म किया। इसलिए तू भी वही कर्म कर जो पूर्वजों ने प्राचीन काल में किया।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥16॥
कर्म क्या है और अकर्म क्या, इसमें बुद्धिमान भी उलझ जाते हैं। वह कर्म मैं तुझे बताऊँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से छूट जाएगा।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥17॥
कर्म को भी समझना चाहिए, विकर्म को भी समझना चाहिए, और अकर्म को भी। कर्म की गति गहरी है।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥18॥
जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है, वही योगी है, वही सब कर्म करने वाला है।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥19॥
जिसके सब आरंभ कामना और संकल्प से रहित हैं, ज्ञान की अग्नि में जिसके कर्म जल गए हैं, उसे ज्ञानी लोग पंडित कहते हैं।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥20॥
कर्मफल की आसक्ति छोड़कर, सदा तृप्त और किसी आश्रय से रहित वह कर्म में लगा रहकर भी कुछ नहीं करता।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥21॥
आशा रहित, मन और शरीर को वश में रखने वाला, सब संग्रह छोड़कर केवल शरीर से कर्म करता हुआ वह पाप नहीं पाता।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥22॥
जो अपने आप मिल जाए उसी में संतुष्ट, द्वंद्वों से परे, ईर्ष्या रहित, सफलता और असफलता में समान, वह कर्म करके भी नहीं बँधता।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥23॥
जिसकी आसक्ति चली गई, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, जो यज्ञ के लिए कर्म करता है, उसका सारा कर्म विलीन हो जाता है।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥24॥
अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्म ने ही हवन किया। ब्रह्म के कर्म में समाधि रखने वाले को ब्रह्म ही मिलता है।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥25॥
कुछ योगी देवताओं के उद्देश्य से यज्ञ करते हैं, और कुछ ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ द्वारा ही यज्ञ की आहुति देते हैं।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥26॥
कुछ श्रोत्र आदि इंद्रियों को संयम की अग्नि में हवन करते हैं, और कुछ शब्द आदि विषयों को इंद्रियों की अग्नि में।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥27॥
कुछ इंद्रियों के सब कर्मों और प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयमयोग की अग्नि में हवन करते हैं।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥28॥
कुछ द्रव्य से यज्ञ करते हैं, कुछ तप से, कुछ योग से, और कुछ कठिन व्रत वाले यती स्वाध्याय और ज्ञान से।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥29॥
कुछ प्राण की गति को रोककर, अपान में प्राण का और प्राण में अपान का हवन करते हुए प्राणायाम में लगे रहते हैं।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥30॥
कुछ नियमित आहार करके प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सब यज्ञ को जानने वाले हैं, और यज्ञ से इनके पाप मिट जाते हैं।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥31॥
हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ से बचे अमृत को खाने वाले सनातन ब्रह्म को पाते हैं। जो यज्ञ नहीं करता उसके लिए यह लोक भी नहीं, फिर दूसरा कहाँ?
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥32॥
इस तरह ब्रह्म के मुख में अनेक प्रकार के यज्ञ फैले हुए हैं। इन सबको कर्म से उत्पन्न जान। यह जानकर तू मुक्त हो जाएगा।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥33॥
हे परंतप! द्रव्य से किए यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ! सारा कर्म अंत में ज्ञान में ही पूरा होता है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥34॥
उसे प्रणाम करके, प्रश्न पूछकर और सेवा करके जान। तत्त्व देखने वाले ज्ञानी तुझे ज्ञान का उपदेश देंगे।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥35॥
हे पांडव! उसे जानकर तू फिर इस तरह मोह में नहीं पड़ेगा, और सब प्राणियों को अपने में तथा मुझमें देखेगा।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥36॥
यदि तू सब पापियों में भी सबसे बड़ा पापी हो, तब भी ज्ञान की नाव से सारे पाप-समुद्र को पार कर जाएगा।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥37॥
हे अर्जुन! जैसे जलती आग लकड़ियों को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सब कर्मों को राख कर देती है।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥38॥
यहाँ ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं है। योग में सिद्ध हुआ मनुष्य समय पाकर उसे अपने भीतर ही पा लेता है।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥39॥
श्रद्धावान, तत्पर और इंद्रियों को वश में रखने वाला ज्ञान पाता है। ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥40॥
अज्ञानी, श्रद्धा रहित और संशय वाला नष्ट हो जाता है। संशय वाले के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥41॥
हे धनंजय! जिसने योग से कर्म अर्पित कर दिए, ज्ञान से संशय काट दिया और जो आत्मवान है, उसे कर्म नहीं बाँधते।
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥42॥
इसलिए हे भारत! हृदय में बैठे अज्ञान से उपजे इस संशय को ज्ञान की तलवार से काटकर योग में स्थित हो और खड़ा हो।
संस्कृत पाठ तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर जाँचा गया है। अर्थ किसी प्रकाशित अनुवाद से नहीं लिया गया, संस्कृत से सीधे सरल भाषा में लिखा गया है।
श्री कृष्ण की सभी सामग्री देखें →भगवद्गीता के अध्याय 4 में कितने श्लोक हैं?
अध्याय 4 "ज्ञान कर्म संन्यास योग" में 42 श्लोक हैं।
गीता का अध्याय 4 किस विषय में है?
कृष्ण बताते हैं कि यह उपदेश नया नहीं है, यह परंपरा से चला आया और बीच में लुप्त हो गया। अर्जुन का सवाल स्वाभाविक है: आपका जन्म तो अभी हुआ, आपने यह पहले कैसे कहा? इसी से अवतार की बात निकलती है, और वे दो श्लोक आते हैं जो आज भी सबसे अधिक उद्धृत होते हैं: जब-जब धर्म घटता है, तब-तब मैं आता हूँ। बाकी अध्याय इस पेचीदा सवाल पर है कि कर्म क्या है और अकर्म क्या, और यह कि ज्ञान की आग कर्म के बंधन को कैसे जला देती है। अंत में गुरु के पास कैसे जाएँ, यह भी बताया गया है: झुककर, पूछकर, सेवा करके।