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    अध्याय 6 · 47 श्लोक

    आत्म संयम योग

    आत्मसंयमयोग

    इस अध्याय में

    यह सबसे व्यावहारिक अध्याय है। आसन कहाँ लगाएँ, कितना ऊँचा हो, सिर और गर्दन कैसे रखें, दृष्टि कहाँ टिकाएँ, यह सब इसमें है। बीच में वह पंक्ति आती है जो अकेली भी काफी है: अपना उद्धार अपने आप कर, आदमी खुद ही अपना मित्र है और खुद ही अपना शत्रु। खाने-सोने में अति न करने की सलाह भी है। फिर अर्जुन वही कहते हैं जो कोई भी कहेगा: मन तो हवा जैसा है, इसे कैसे बाँधें। कृष्ण मानते हैं कि हाँ, कठिन है, और दो ही उपाय देते हैं: अभ्यास और पकड़ ढीली करना। अंत में यह आश्वासन है कि बीच में छूट गया साधक भी बरबाद नहीं होता।

    मुख्य बात

    मन को बाँधना कठिन है, पर असंभव नहीं। रास्ता दो ही हैं: अभ्यास, और पकड़ छोड़ना।

    श्लोक

    श्रीभगवान उवाच

    6.1

    अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
    स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥1॥

    श्रीभगवान बोले: जो कर्मफल का आसरा लिए बिना करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी। अग्नि छोड़ देने वाला या कर्म छोड़ देने वाला नहीं।

    6.2

    यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
    न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥2॥

    हे पांडव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को योग जान। संकल्प छोड़े बिना कोई योगी नहीं होता।

    6.3

    आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
    योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥3॥

    योग पर चढ़ना चाहने वाले मुनि के लिए कर्म साधन कहा जाता है, और योग पर चढ़ चुके के लिए शम।

    6.4

    यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
    सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥4॥

    जब मनुष्य न इंद्रिय-विषयों में आसक्त होता है, न कर्मों में, और सब संकल्प छोड़ देता है, तब उसे योगारूढ़ कहते हैं।

    6.5

    उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
    आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥5॥

    अपना उद्धार अपने आप कर, अपने को गिरने मत दे। मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

    6.6

    बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
    अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥6॥

    जिसने अपने आप से अपने को जीत लिया, उसके लिए वह अपना मित्र है। जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही अपना शत्रु की तरह बरतता है।

    6.7

    जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
    शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥7॥

    अपने को जीत लेने वाले शांत पुरुष का परमात्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुख और मान-अपमान में समान रूप से टिका रहता है।

    6.8

    ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
    युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥8॥

    ज्ञान और विज्ञान से तृप्त, अविचल, इंद्रियों को जीते हुए, मिट्टी, पत्थर और सोने को समान देखने वाला योगी युक्त कहलाता है।

    6.9

    सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
    साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥9॥

    हितैषी, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी और बंधु में, तथा साधु और पापी में भी समान बुद्धि रखने वाला श्रेष्ठ है।

    6.10

    योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
    एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥10॥

    योगी एकांत में रहकर, अकेला, चित्त और शरीर को वश में रखकर, आशा और संग्रह छोड़कर, निरंतर अपने को योग में लगाए।

    6.11

    शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
    नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥11॥

    स्वच्छ जगह पर अपना स्थिर आसन बिछाए, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा, जिस पर कुश, मृगचर्म और वस्त्र क्रम से बिछे हों।

    6.12

    तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
    उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥12॥

    वहाँ आसन पर बैठकर, चित्त और इंद्रियों की चेष्टा को वश में करके, मन को एकाग्र करके, आत्मशुद्धि के लिए योग करे।

    6.13

    समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
    सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥13॥

    शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और अचल रखकर, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग को देखता हुआ और इधर-उधर न देखता हुआ।

    6.14

    प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
    मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥14॥

    शांत मन वाला, निर्भय, ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित, मन को संयत करके, मुझमें चित्त लगाकर, मुझे ही परम मानकर बैठे।

    6.15

    युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
    शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥15॥

    इस तरह मन को वश में रखकर सदा अपने को योग में लगाने वाला योगी मुझमें रहने वाली, निर्वाण रूप परम शांति को पाता है।

    6.16

    नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
    न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥16॥

    हे अर्जुन! योग न बहुत खाने वाले का होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का, न बहुत सोने वाले का, न बहुत जागने वाले का।

    6.17

    युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
    युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥17॥

    जिसका खाना-पीना और घूमना संयमित है, जिसकी चेष्टाएँ कर्मों में संयमित हैं, जिसका सोना-जागना संयमित है, उसी का योग दुख मिटाता है।

    6.18

    यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
    निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥18॥

    जब वश में किया हुआ चित्त आत्मा में ही टिक जाता है और सब कामनाओं से लालसा हट जाती है, तब उसे युक्त कहते हैं।

    6.19

    यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
    योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥19॥

    जैसे बिना हवा की जगह रखा दीपक नहीं हिलता, वही उपमा उस योगी की कही गई है जिसका चित्त वश में है और जो आत्मा के योग में लगा है।

    6.20

    यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
    यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥20॥

    योग के अभ्यास से रुका हुआ चित्त जहाँ शांत हो जाता है, और जहाँ वह आत्मा से आत्मा को देखकर आत्मा में ही संतुष्ट होता है,

    6.21

    सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
    वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥21॥

    जहाँ वह उस अत्यंत सुख को जानता है जो बुद्धि से ग्रहण होता है और इंद्रियों से परे है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से डिगता नहीं,

    6.22

    यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
    यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥22॥

    जिसे पाकर वह उससे बड़ा कोई लाभ नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह भारी दुख से भी विचलित नहीं होता,

    6.23

    तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
    स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥23॥

    उसी को दुख के संयोग से वियोग जान, जिसका नाम योग है। उस योग को बिना उकताए, निश्चय के साथ करना चाहिए।

    6.24

    सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
    मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥24॥

    संकल्प से पैदा होने वाली सब कामनाओं को पूरी तरह छोड़कर, मन से ही इंद्रियों के समूह को सब ओर से वश में करके,

    6.25

    शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
    आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥25॥

    धैर्य से पकड़ी हुई बुद्धि से धीरे-धीरे शांत हो, मन को आत्मा में टिकाकर और कुछ भी न सोचे।

    6.26

    यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
    ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥26॥

    यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भागे, वहाँ-वहाँ से इसे रोककर आत्मा में ही वश में ले आए।

    6.27

    प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
    उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥27॥

    जिसका मन शांत है, जिसका रजोगुण शांत हो गया, जो निष्पाप है और ब्रह्म बन चुका है, उस योगी को उत्तम सुख अपने आप मिलता है।

    6.28

    युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
    सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥28॥

    इस तरह सदा अपने को योग में लगाने वाला, पापरहित योगी सहज ही ब्रह्म के स्पर्श से मिलने वाला अत्यंत सुख भोगता है।

    6.29

    सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
    ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥29॥

    योग में लगा हुआ, हर जगह समान देखने वाला आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है।

    6.30

    यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
    तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥30॥

    जो मुझे सब जगह देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं ओझल नहीं होता और वह मेरे लिए ओझल नहीं होता।

    6.31

    सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
    सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥31॥

    जो एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में रहने वाले मुझे भजता है, वह योगी चाहे जैसे भी रहे, मुझमें ही रहता है।

    6.32

    आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
    सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥32॥

    हे अर्जुन! जो अपनी तरह ही सबको समान देखता है, सुख हो या दुख, वही योगी सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

    अर्जुन उवाच

    6.33

    योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
    एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥33॥

    अर्जुन बोले: हे मधुसूदन! समता वाला यह योग जो आपने कहा, मन की चंचलता के कारण मुझे इसकी स्थिर स्थिति नहीं दिखती।

    6.34

    चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ।
    तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥34॥

    हे कृष्ण! मन चंचल है, मथ डालने वाला है, बलवान और जिद्दी है। उसे रोकना मुझे हवा को रोकने जितना कठिन लगता है।

    श्रीभगवान उवाच

    6.35

    असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
    अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥35॥

    श्रीभगवान बोले: हे महाबाहो! निस्संदेह मन चंचल है और कठिनाई से वश में आता है। पर हे कौंतेय! अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आ जाता है।

    6.36

    असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
    वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥36॥

    जिसका मन वश में नहीं, उसके लिए योग कठिन है, यह मेरा मत है। पर जो अपने वश में है और प्रयत्न करता है, वह उपाय से इसे पा सकता है।

    अर्जुन उवाच

    6.37

    अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
    अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥37॥

    अर्जुन बोले: हे कृष्ण! जो श्रद्धा तो रखता है पर संयम नहीं कर पाता और जिसका मन योग से डिग जाता है, वह योग की सिद्धि न पाकर किस गति को जाता है?

    6.38

    कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
    अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥38॥

    हे महाबाहो! क्या वह दोनों ओर से चूककर, आश्रयहीन होकर, ब्रह्म के मार्ग में मोहित होकर छिन्न बादल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता?

    6.39

    एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
    त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥39॥

    हे कृष्ण! मेरा यह संशय पूरी तरह काटने योग्य आप ही हैं। आपके सिवा इस संशय को काटने वाला कोई नहीं मिलेगा।

    श्रीभगवान उवाच

    6.40

    पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
    न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥40॥

    श्रीभगवान बोले: हे पार्थ! उसका न इस लोक में नाश होता है, न परलोक में। हे तात! भला करने वाला कोई भी बुरी गति को नहीं जाता।

    6.41

    प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
    शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥41॥

    योग से डिगा हुआ पुण्य करने वालों के लोक पाकर, वहाँ बहुत वर्ष रहकर, फिर पवित्र और संपन्न लोगों के घर में जन्म लेता है।

    6.42

    अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
    एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥42॥

    या फिर बुद्धिमान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है। ऐसा जन्म संसार में और भी दुर्लभ है।

    6.43

    तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
    यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥43॥

    हे कुरुनंदन! वहाँ उसे पिछले शरीर की बुद्धि का संयोग मिल जाता है, और फिर वह सिद्धि के लिए और भी अधिक प्रयत्न करता है।

    6.44

    पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
    जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥44॥

    उसी पहले के अभ्यास से वह विवश होकर भी खिंच जाता है। योग को जानने की इच्छा रखने वाला भी शब्दब्रह्म से आगे निकल जाता है।

    6.45

    प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
    अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥45॥

    प्रयत्न से अभ्यास करता हुआ योगी पापों से पूरी तरह शुद्ध होकर, अनेक जन्मों में सिद्ध होकर, परम गति को प्राप्त होता है।

    6.46

    तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
    कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥46॥

    योगी तपस्वियों से बढ़कर है, ज्ञानियों से भी बढ़कर माना गया है, और कर्म करने वालों से भी बढ़कर। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन।

    6.47

    योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
    श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥47॥

    और सब योगियों में भी जो श्रद्धावान मुझमें अपना अंतरात्मा लगाकर मुझे भजता है, वही मुझे सबसे अधिक युक्त लगता है।

    संस्कृत पाठ तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर जाँचा गया है। अर्थ किसी प्रकाशित अनुवाद से नहीं लिया गया, संस्कृत से सीधे सरल भाषा में लिखा गया है।

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    सामान्य प्रश्न

    भगवद्गीता के अध्याय 6 में कितने श्लोक हैं?

    अध्याय 6 "आत्म संयम योग" में 47 श्लोक हैं।

    गीता का अध्याय 6 किस विषय में है?

    यह सबसे व्यावहारिक अध्याय है। आसन कहाँ लगाएँ, कितना ऊँचा हो, सिर और गर्दन कैसे रखें, दृष्टि कहाँ टिकाएँ, यह सब इसमें है। बीच में वह पंक्ति आती है जो अकेली भी काफी है: अपना उद्धार अपने आप कर, आदमी खुद ही अपना मित्र है और खुद ही अपना शत्रु। खाने-सोने में अति न करने की सलाह भी है। फिर अर्जुन वही कहते हैं जो कोई भी कहेगा: मन तो हवा जैसा है, इसे कैसे बाँधें। कृष्ण मानते हैं कि हाँ, कठिन है, और दो ही उपाय देते हैं: अभ्यास और पकड़ ढीली करना। अंत में यह आश्वासन है कि बीच में छूट गया साधक भी बरबाद नहीं होता।