श्रीभगवान उवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥1॥
श्रीभगवान बोले: हे पार्थ! मुझमें मन लगाकर, मेरा आश्रय लेकर योग करते हुए तू मुझे पूरी तरह और निस्संदेह कैसे जानेगा, वह सुन।
अध्याय 7 · 30 श्लोक
ज्ञानविज्ञानयोग
यहाँ से कृष्ण अपने बारे में कहना शुरू करते हैं। वे अपनी प्रकृति को दो हिस्सों में बाँटते हैं, और फिर वह पंक्ति कहते हैं जो सबसे सीधी है: सब कुछ मुझमें ऐसे पिरोया है जैसे धागे में मणियाँ। इसके बाद की सूची पढ़ने लायक है: पानी में स्वाद, चाँद और सूरज में चमक, पृथ्वी में गंध, तपस्वियों में तप। वे यह भी कहते हैं कि उन्हें भजने वाले चार तरह के होते हैं, दुखी, जिज्ञासु, कुछ चाहने वाला, और जानने वाला, और चारों को वे अपना मानते हैं।
जो कुछ है, उसी में वह पिरोया हुआ है। और चारों तरह के भक्त उसके अपने हैं।
श्रीभगवान उवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥1॥
श्रीभगवान बोले: हे पार्थ! मुझमें मन लगाकर, मेरा आश्रय लेकर योग करते हुए तू मुझे पूरी तरह और निस्संदेह कैसे जानेगा, वह सुन।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥2॥
मैं तुझे यह ज्ञान विज्ञान सहित पूरा कहूँगा, जिसे जान लेने पर यहाँ और कुछ जानना शेष नहीं रहता।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥3॥
हजारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है, और प्रयत्न करने वाले सिद्धों में भी कोई एक मुझे तत्त्व से जानता है।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥4॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार: यह मेरी आठ भागों में बँटी प्रकृति है।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥5॥
हे महाबाहो! यह मेरी अपरा प्रकृति है। इससे अलग मेरी दूसरी परा प्रकृति जान, जो जीव रूप है और जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥6॥
यह जान ले कि सब प्राणी इन्हीं दोनों से उत्पन्न हुए हैं। मैं ही सारे जगत् का उद्गम हूँ और प्रलय भी।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥7॥
हे धनंजय! मुझसे परे और कुछ भी नहीं है। यह सब मुझमें उसी तरह पिरोया है जैसे धागे में मणियाँ।
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥8॥
हे कौंतेय! जल में रस मैं हूँ, चंद्र और सूर्य में प्रभा मैं हूँ, सब वेदों में ॐकार, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पौरुष मैं हूँ।
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥9॥
पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में तेज मैं हूँ। सब प्राणियों में जीवन और तपस्वियों में तप मैं हूँ।
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥10॥
हे पार्थ! मुझे सब प्राणियों का सनातन बीज जान। बुद्धिमानों की बुद्धि मैं हूँ, तेजस्वियों का तेज मैं हूँ।
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥11॥
हे भरतश्रेष्ठ! बलवानों का वह बल मैं हूँ जो काम और राग से रहित है, और प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न जाने वाली इच्छा मैं हूँ।
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥12॥
जो भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भाव हैं, उन्हें मुझसे ही हुआ जान। पर मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥13॥
इन तीनों गुणों वाले भावों से मोहित यह सारा जगत् मुझ अविनाशी को नहीं जानता, जो इनसे परे हूँ।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥14॥
गुणों वाली यह मेरी दिव्य माया पार करना कठिन है। जो मेरी ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥15॥
दुष्कर्म करने वाले, मूढ़, नराधम मेरी शरण नहीं लेते। माया ने उनका ज्ञान हर लिया है और उन्होंने आसुरी भाव अपना लिया है।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥16॥
हे भरतश्रेष्ठ! हे अर्जुन! चार प्रकार के पुण्यशाली लोग मुझे भजते हैं: दुखी, जिज्ञासु, अर्थ चाहने वाला और ज्ञानी।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥17॥
इनमें नित्ययुक्त और एकनिष्ठ भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है। ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥18॥
ये सब उदार हैं, पर ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है। वह युक्त चित्त से मुझ अनुत्तम गति में ही स्थित है।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥19॥
बहुत जन्मों के अंत में ज्ञानवान मेरी शरण लेता है, यह जानकर कि सब कुछ वासुदेव ही है। ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ है।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥20॥
उन-उन कामनाओं से जिनका ज्ञान हर लिया गया, वे अपनी प्रकृति से बँधकर, उस-उस नियम को अपनाकर दूसरे देवताओं की शरण लेते हैं।
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥21॥
जो भक्त जिस-जिस रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उसकी उसी श्रद्धा को मैं अचल कर देता हूँ।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥22॥
वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उसकी आराधना करता है और उससे अपनी कामनाएँ पाता है, जो वास्तव में मेरे ही दिए हुए हैं।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥23॥
पर उन अल्पबुद्धि वालों का वह फल नाशवान होता है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को जाते हैं, मेरे भक्त मुझे ही पाते हैं।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥24॥
बुद्धिहीन लोग मेरे परम, अविनाशी और अनुत्तम भाव को न जानकर मुझ अव्यक्त को व्यक्त हुआ मानते हैं।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥25॥
योगमाया से ढका हुआ मैं सबके सामने प्रकट नहीं होता। यह मूढ़ संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥26॥
हे अर्जुन! मैं बीते हुए, वर्तमान और आने वाले सब प्राणियों को जानता हूँ, पर मुझे कोई नहीं जानता।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥27॥
हे भारत! हे परंतप! इच्छा और द्वेष से उठने वाले द्वंद्व के मोह से सब प्राणी जन्म लेते ही मोहित हो जाते हैं।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥28॥
पर जिन पुण्यकर्मी लोगों का पाप समाप्त हो गया, वे द्वंद्व के मोह से छूटकर दृढ़ व्रत के साथ मुझे भजते हैं।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥29॥
जो जरा और मृत्यु से छूटने के लिए मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, पूरे अध्यात्म को और समूचे कर्म को जान लेते हैं।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥30॥
जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित जानते हैं, वे युक्त चित्त वाले प्रयाण के समय भी मुझे जानते हैं।
संस्कृत पाठ तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर जाँचा गया है। अर्थ किसी प्रकाशित अनुवाद से नहीं लिया गया, संस्कृत से सीधे सरल भाषा में लिखा गया है।
श्री कृष्ण की सभी सामग्री देखें →भगवद्गीता के अध्याय 7 में कितने श्लोक हैं?
अध्याय 7 "ज्ञान विज्ञान योग" में 30 श्लोक हैं।
गीता का अध्याय 7 किस विषय में है?
यहाँ से कृष्ण अपने बारे में कहना शुरू करते हैं। वे अपनी प्रकृति को दो हिस्सों में बाँटते हैं, और फिर वह पंक्ति कहते हैं जो सबसे सीधी है: सब कुछ मुझमें ऐसे पिरोया है जैसे धागे में मणियाँ। इसके बाद की सूची पढ़ने लायक है: पानी में स्वाद, चाँद और सूरज में चमक, पृथ्वी में गंध, तपस्वियों में तप। वे यह भी कहते हैं कि उन्हें भजने वाले चार तरह के होते हैं, दुखी, जिज्ञासु, कुछ चाहने वाला, और जानने वाला, और चारों को वे अपना मानते हैं।