अर्जुन उवाच
किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥1॥
अर्जुन बोले: हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहा गया है और अधिदैव किसे?
अध्याय 8 · 28 श्लोक
अक्षरब्रह्मयोग
अर्जुन के सात सवालों से अध्याय शुरू होता है, और उनमें एक सबसे भारी है: अंत समय में आपको कैसे जाना जाए। कृष्ण का उत्तर आसान भी है और कठिन भी: आदमी अंत में उसी को याद करता है जिसमें वह जीवन भर रमा रहा, इसलिए अभी से याद करो, और लड़ो भी। यहीं ॐ का उच्चारण करते हुए शरीर छोड़ने की बात आती है। अध्याय का बाकी हिस्सा समय के बड़े पैमाने पर है, ब्रह्मा के दिन और रात, और वे दो मार्ग जिनसे जाने वाले लौटते हैं या नहीं लौटते।
अंत में वही याद आता है जिसमें आदमी जीवन भर रहा। इसलिए याद अभी से रखनी है।
अर्जुन उवाच
किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥1॥
अर्जुन बोले: हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहा गया है और अधिदैव किसे?
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥2॥
हे मधुसूदन! इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और कैसे है? और प्रयाण के समय संयमी लोग आपको किस तरह जानते हैं?
श्रीभगवान उवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥3॥
श्रीभगवान बोले: अक्षर ही परम ब्रह्म है। अपना स्वभाव अध्यात्म कहलाता है। प्राणियों के भाव को उत्पन्न करने वाला विसर्ग कर्म कहलाता है।
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥4॥
हे देहधारियों में श्रेष्ठ! नाशवान भाव अधिभूत है, पुरुष अधिदैव है, और इस शरीर में अधियज्ञ मैं ही हूँ।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥5॥
अंतकाल में जो मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥6॥
हे कौंतेय! अंत में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ मनुष्य शरीर छोड़ता है, वह उसी को पाता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव में रमा रहा है।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥7॥
इसलिए हर समय मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मुझमें मन और बुद्धि अर्पित करके तू निस्संदेह मुझे ही पाएगा।
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥8॥
हे पार्थ! अभ्यास के योग से युक्त और कहीं न भटकने वाले चित्त से चिंतन करता हुआ मनुष्य परम दिव्य पुरुष को पाता है।
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥9॥
जो उस कवि, पुरातन, शासन करने वाले, अणु से भी सूक्ष्म, सबको धारण करने वाले, अचिंत्य रूप वाले, सूर्य के समान तेजस्वी और अंधकार से परे का स्मरण करता है,
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥10॥
वह प्रयाण के समय अचल मन से, भक्ति और योग के बल से, प्राण को भौंहों के बीच ठीक से स्थापित करके उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥11॥
जिसे वेद जानने वाले अक्षर कहते हैं, जिसमें राग रहित यती प्रवेश करते हैं, जिसकी इच्छा से लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद मैं तुझे संक्षेप में बताऊँगा।
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥12॥
सब द्वारों को रोककर, मन को हृदय में बाँधकर, अपने प्राण को सिर में स्थापित करके, योग की धारणा में स्थित होकर,
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥13॥
जो ॐ इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, वह परम गति पाता है।
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥14॥
हे पार्थ! जो अनन्य चित्त से सदा, नित्य मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ।
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥15॥
मुझे पाकर महात्मा फिर दुखों के घर और अनित्य जन्म को नहीं पाते, क्योंकि वे परम सिद्धि पा चुके होते हैं।
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥16॥
हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक के सब लोक लौटाने वाले हैं। पर हे कौंतेय! मुझे पा लेने पर फिर जन्म नहीं होता।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥17॥
जो जानते हैं कि ब्रह्मा का एक दिन हजार युगों तक चलता है और रात भी हजार युगों तक, वही दिन-रात को जानने वाले लोग हैं।
अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥18॥
दिन आने पर सब व्यक्त अव्यक्त से प्रकट होते हैं, और रात आने पर उसी अव्यक्त कहलाने वाले में लीन हो जाते हैं।
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥19॥
हे पार्थ! यही प्राणियों का समूह बार-बार होकर, रात आने पर विवश होकर लीन होता है और दिन आने पर फिर प्रकट होता है।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥20॥
पर उस अव्यक्त से परे एक और सनातन अव्यक्त भाव है, जो सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥21॥
उसी को अव्यक्त और अक्षर कहा गया है, उसी को परम गति कहते हैं। जिसे पाकर लौटना नहीं होता, वही मेरा परम धाम है।
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥22॥
हे पार्थ! वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही मिलता है, जिसके भीतर सब प्राणी हैं और जिससे यह सब फैला हुआ है।
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥23॥
हे भरतश्रेष्ठ! जिस काल में जाकर योगी लौटते नहीं और जिसमें जाकर लौटते हैं, उस काल को मैं कहूँगा।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥24॥
अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीने: इसमें जाने वाले ब्रह्म को जानने वाले लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥25॥
धुआँ, रात, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने: इसमें जाने वाला योगी चंद्रमा की ज्योति पाकर लौट आता है।
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥26॥
जगत् के ये शुक्ल और कृष्ण, दो मार्ग सनातन माने गए हैं। एक से जाने वाला लौटता नहीं, दूसरे से जाने वाला लौट आता है।
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥27॥
हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! हर समय योग में युक्त रह।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥28॥
वेदों में, यज्ञों में, तपों में और दानों में जो पुण्यफल कहा गया है, यह जान लेने पर योगी उस सबसे आगे निकल जाता है और आदि परम स्थान को पाता है।
संस्कृत पाठ तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर जाँचा गया है। अर्थ किसी प्रकाशित अनुवाद से नहीं लिया गया, संस्कृत से सीधे सरल भाषा में लिखा गया है।
श्री कृष्ण की सभी सामग्री देखें →भगवद्गीता के अध्याय 8 में कितने श्लोक हैं?
अध्याय 8 "अक्षर ब्रह्म योग" में 28 श्लोक हैं।
गीता का अध्याय 8 किस विषय में है?
अर्जुन के सात सवालों से अध्याय शुरू होता है, और उनमें एक सबसे भारी है: अंत समय में आपको कैसे जाना जाए। कृष्ण का उत्तर आसान भी है और कठिन भी: आदमी अंत में उसी को याद करता है जिसमें वह जीवन भर रमा रहा, इसलिए अभी से याद करो, और लड़ो भी। यहीं ॐ का उच्चारण करते हुए शरीर छोड़ने की बात आती है। अध्याय का बाकी हिस्सा समय के बड़े पैमाने पर है, ब्रह्मा के दिन और रात, और वे दो मार्ग जिनसे जाने वाले लौटते हैं या नहीं लौटते।