
कनकधारा स्तोत्रम्
Kanakadhara Stotram
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्। अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥ मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि। माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥ आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द- मानन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्। आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः॥ बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति। कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः॥ ... (कनकधारा स्तोत्रम् के शेष श्लोक आदि शंकराचार्य द्वारा रचित देवी लक्ष्मी की स्तुति के रूप में इसी क्रम में जारी रहते हैं) ॥ फलश्रुति ॥ यः श्लोकपञ्चकमिदं समवाप्तलक्ष्मी- र्भूयादसंशयमुमामहितो जनोऽयम्। स्तुत्वेत्थं वेधसाहरिं सन्ततमेव विष्णुं भूतिं समिच्छति भवानभिवाञ्छति भूत्यै॥
अर्थ
कनकधारा स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित देवी लक्ष्मी की सुप्रसिद्ध स्तुति है। कथा के अनुसार, बाल्यकाल में शंकराचार्य ने एक निर्धन ब्राह्मणी के घर भिक्षा मांगी; उसके पास देने के लिए केवल एक सूखा आंवला था। उसकी दीनता देखकर शंकराचार्य ने तत्काल इस स्तोत्र की रचना कर देवी लक्ष्मी की स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने स्वर्ण आंवलों की वर्षा कर दी। इसी कारण इसे "कनकधारा" (स्वर्ण की धारा) स्तोत्र कहा जाता है।
लाभ
- 🪷आर्थिक तंगी और दरिद्रता दूर करने हेतु पाठ किया जाता है
- 🪷देवी लक्ष्मी की कृपा और समृद्धि प्राप्ति की मान्यता है
- 🪷शुक्रवार को विशेष रूप से पढ़ा जाता है
- 🪷व्यापार या नए कार्य आरंभ में शुभ माना जाता है
जप/पाठ विधि
प्रातःकाल स्नान के बाद देवी लक्ष्मी के चित्र के समक्ष दीपक जलाकर श्रद्धा के साथ पाठ करें। नियमित रूप से 21 दिनों तक पाठ करने की परंपरा है।
सर्वोत्तम समय
शुक्रवार तथा प्रातःकाल सर्वोत्तम माना जाता है।