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    19 मार्च

    गुड़ी पड़वा

    महाराष्ट्र व कोंकण क्षेत्र का पारंपरिक नववर्ष — गुड़ी फहराने की परंपरा

    ⏳ 214 दिन शेष (2027)

    इतिहास

    गुड़ी पड़वा चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है और महाराष्ट्रीय व कोंकणी हिंदू नववर्ष का प्रतीक है। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी। इस दिन घरों के मुख्य द्वार पर रेशमी वस्त्र, नीम के पत्ते, फूलों की माला व उल्टे कलश से सुसज्जित "गुड़ी" (विजय ध्वज) फहराई जाती है, जो सुख-समृद्धि व विजय का प्रतीक मानी जाती है।

    महत्व

    यह दिन शालिवाहन शक संवत् के नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है, और इसे नए वर्ष के शुभ आरंभ, नई खरीदारी व व्यवसाय-आरंभ हेतु अत्यंत शुभ माना जाता है।

    पूजा विधि

    प्रातः स्नान कर घर के मुख्य द्वार पर गुड़ी फहराएं। ब्रह्मा जी की पूजा करें, और परंपरागत मिष्ठान "श्रीखंड-पूरी" व नीम के पत्तों का प्रसाद ग्रहण करें, जो कड़वे-मीठे जीवन के संतुलन का प्रतीक माना जाता है।

    मुहूर्त

    प्रातःकाल गुड़ी फहराने व पूजा हेतु शुभ माना जाता है; सटीक तिथि व समय हेतु पंचांग देखें।

    आज का पंचांग देखें →

    क्या करें व क्या न करें

    ✅ क्या करें

    • घर के मुख्य द्वार पर गुड़ी फहराएं
    • नीम के पत्तों का प्रसाद ग्रहण करें
    • नए वर्ष हेतु नई शुरुआत करें

    ❌ क्या न करें

    • इस दिन नकारात्मकता व विवाद से बचें

    FAQ

    उल्टा रखा तांबे का कलश विजय व समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, और इसे शत्रुओं पर विजय व बुराई पर अच्छाई की जीत के संदेश के रूप में देखा जाता है।