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    29 अक्टूबर

    करवा चौथ

    पति की दीर्घायु व सुखी दांपत्य जीवन हेतु निर्जला व्रत

    ⏳ 73 दिन शेष (2026)

    इतिहास

    करवा चौथ कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाता है, जब विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु व सुखी दांपत्य जीवन हेतु प्रातःकाल से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत की कथा वीरवती नामक रानी से जुड़ी बताई जाती है, जिसने अपने पति की रक्षा हेतु यह व्रत रखा था। परंपरागत रूप से यह उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक प्रचलित है।

    महत्व

    व्रत का समापन चंद्रमा को अर्घ्य देकर व एक छलनी से पति का मुख देखकर किया जाता है, उसके पश्चात् पति द्वारा पत्नी को जल पिलाकर व्रत खुलवाया जाता है। यह परंपरा दांपत्य प्रेम व परस्पर समर्पण के प्रतीक स्वरूप मनाई जाती है।

    पूजा विधि

    प्रातःकाल "सरगी" (सास द्वारा दी गई विशेष भोजन-सामग्री) ग्रहण कर व्रत आरंभ करें। दिन भर निर्जला व्रत रखें, संध्या में करवा माता व शिव-पार्वती की कथा सुनें/पढ़ें, और चंद्रोदय पर छलनी से चंद्रमा व पति का मुख देखकर व्रत का पारण करें।

    मुहूर्त

    पूजा का शुभ समय सायंकाल में होता है, जबकि व्रत-पारण चंद्रोदय के सटीक समय पर निर्भर करता है, जो प्रतिवर्ष व शहर अनुसार भिन्न होता है — स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।

    आज का पंचांग देखें →

    क्या करें व क्या न करें

    ✅ क्या करें

    • सरगी ग्रहण कर व्रत आरंभ करें
    • शिव-पार्वती व करवा माता की कथा सुनें
    • चंद्रोदय पर विधिपूर्वक अर्घ्य देकर व्रत खोलें

    ❌ क्या न करें

    • दिन भर जल या भोजन ग्रहण न करें (जब तक स्वास्थ्य कारणों से चिकित्सकीय सलाह न हो)
    • व्रत के दौरान क्रोध व नकारात्मकता से बचें

    FAQ

    यह परंपरा प्रतीकात्मक मानी जाती है — छलनी से देखने पर प्रकाश छनकर आता है, जिसे व्रत की पवित्रता व सतर्कतापूर्वक निभाई गई प्रतिज्ञा का प्रतीक माना जाता है।