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    26 सितंबर

    पितृ पक्ष (श्राद्ध)

    पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि व तर्पण का सोलह-दिवसीय पवित्र काल

    ⏳ 40 दिन शेष (2026)

    इतिहास

    पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक, लगभग सोलह दिनों तक चलता है। इस अवधि में परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों (पितरों) के निमित्त श्राद्ध कर्म, तर्पण व पिंडदान करते हैं, ताकि उनकी आत्मा को शांति व मोक्ष प्राप्त हो। यह परंपरा गरुड़ पुराण व अन्य शास्त्रों में वर्णित पितृ-ऋण चुकाने के कर्तव्य से जुड़ी मानी जाती है।

    महत्व

    प्रत्येक दिवंगत पूर्वज का श्राद्ध उनकी मृत्यु-तिथि के अनुसार पितृ पक्ष में किए जाने की परंपरा है, जबकि सर्वपितृ अमावस्या को उन सभी पूर्वजों हेतु श्राद्ध किया जाता है जिनकी सटीक तिथि ज्ञात न हो।

    पूजा विधि

    प्रातः स्नान कर पितरों के निमित्त तर्पण (जल-अर्पण) करें, ब्राह्मण भोज व दान करें, और यथासंभव गया, वाराणसी या हरिद्वार जैसे तीर्थों में पिंडदान करने की परंपरा है।

    मुहूर्त

    प्रत्येक पूर्वज का श्राद्ध उनकी मृत्यु-तिथि के अनुरूप पक्ष के भीतर किया जाता है; सटीक तिथि-निर्धारण हेतु पंडित या पंचांग से परामर्श लें।

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    क्या करें व क्या न करें

    ✅ क्या करें

    • पितरों के निमित्त तर्पण व श्राद्ध करें
    • ब्राह्मणों, गरीबों व पशु-पक्षियों को भोजन कराएं
    • इस अवधि में सादगी व संयम बनाए रखें

    ❌ क्या न करें

    • इस अवधि में नई शुरुआत, विवाह व गृह-प्रवेश जैसे शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं
    • मांस-मदिरा व नए वस्त्र-आभूषण की खरीद से बचें

    FAQ

    यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन है, जिस दिन उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु-तिथि ज्ञात न हो अथवा जिनका श्राद्ध किसी कारणवश छूट गया हो।