
नारायण कवच
Narayan Kavach
श्रीराजोवाच — यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्। क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्॥ ब्रह्मोवाच — वृतः पुरस्तादथ दक्षिणे च दिशि विनिर्जित्य त्रिलोकीम्। भगवान् नारायणकवचेन गुप्तो जिष्णुः प्राप सुरेन्द्रलक्ष्मीम्॥ न्यासमाद्यमथाङ्गानां करन्यासमथापि च। हृदयादिन्यासविधिं करन्यासं ततः परम्॥ पूर्वं न्यसेत् पादयोर्जानुनोरूर्वोर्ह्यथोदरे। हृदि कण्ठे च वक्त्रे च शिरस्यायुधमेव च॥ ॐ नमो नारायणाय — इस मूल मंत्र से सम्पूर्ण शरीर का न्यास करते हुए यह कवच पढ़ा जाता है। पादौ हरेः स्थापयन्नाग्रजस्य जङ्घे गदाभृत्पुरुषोत्तमस्य। ऊरू मनोज्ञे नरकान्तकस्य कट्यां च चक्रं गरुडध्वजस्य॥ नाभिं सुनाभस्य कुक्षाविशस्य हृदयं हरेः स्थापय पद्मनाभम्। भुजान्तरे कौस्तुभमप्युदारं कण्ठे च तस्यैव तु शार्ङ्गधन्वनः॥ ... (नारायण कवच के शेष श्लोक श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध में इसी प्रकार भगवान विष्णु के विभिन्न आयुधों और रूपों द्वारा शरीर के प्रत्येक अंग की सुरक्षा हेतु आह्वान के रूप में जारी रहते हैं) ॥ फलश्रुति ॥ य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः। तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात्॥
अर्थ
नारायण कवच श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कन्ध में वर्णित एक सुरक्षा-कवच स्तोत्र है, जिसे देवराज इंद्र ने वृत्रासुर के साथ युद्ध से पूर्व धारण किया था। इसमें भगवान विष्णु के विभिन्न आयुध — शंख, चक्र, गदा, पद्म — तथा उनके विभिन्न नामों का आह्वान कर शरीर के प्रत्येक अंग को सुरक्षा प्रदान करने की प्रार्थना की गई है।
लाभ
- 🪷भय, शत्रु और संकट से रक्षा हेतु पाठ किया जाता है
- 🪷आत्मबल और सुरक्षा की भावना जागृत करता है
- 🪷कठिन परिस्थितियों या यात्रा से पूर्व पढ़ा जाता है
- 🪷विष्णु भक्तों में विशेष श्रद्धा का विषय है
जप/पाठ विधि
प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान विष्णु के चित्र के समक्ष दीपक जलाकर श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
सर्वोत्तम समय
प्रातःकाल तथा किसी कठिन कार्य या यात्रा से पूर्व उपयुक्त माना जाता है।