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    प्रसिद्ध मंदिर

    श्री बांके बिहारी मंदिर

    वृंदावन, मथुरा जिला, उत्तर प्रदेश

    वृंदावन का सबसे अधिक दर्शनार्थी मंदिर — जहाँ पर्दा हर कुछ सेकंड में खुलता-बंद होता है

    एक नज़र में

    स्थान
    वृंदावन, मथुरा जिला, उत्तर प्रदेश
    आराध्य
    श्री बांके बिहारी जी (भगवान कृष्ण)
    श्रेणी
    प्रसिद्ध मंदिर
    परंपरा
    वैष्णव
    निकटतम रेलवे स्टेशन
    मथुरा जंक्शन (लगभग 13 किमी)
    निकटतम हवाई अड्डा
    आगरा हवाई अड्डा (लगभग 74 किमी); इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली (लगभग 160 किमी)
    घूमने का सर्वोत्तम समय
    अक्टूबर से मार्च; जन्माष्टमी, होली व फूल बंगला उत्सव के समय विशेष भव्यता रहती है, पर भीड़ भी अधिक होती है।

    इतिहास

    परंपरा के अनुसार, बांके बिहारी जी की मूर्ति स्वामी हरिदास (संगीत सम्राट तानसेन के गुरु माने जाते हैं) की भक्ति-साधना से निधिवन में प्रकट हुई थी। वर्तमान मंदिर भवन का निर्माण 19वीं शताब्दी में हुआ, और तभी से यह वृंदावन के सबसे लोकप्रिय दर्शन स्थलों में गिना जाता है। यहाँ पारंपरिक शंख या घंटी नहीं बजाई जाती — मान्यता है कि बिहारी जी की चितवन इतनी प्रभावशाली है कि पुजारी हर कुछ क्षणों में पर्दा गिरा देते हैं।

    धार्मिक महत्व

    यह मंदिर वृंदावन आने वाले लगभग हर तीर्थयात्री के दर्शन कार्यक्रम में शामिल होता है, और होली, जन्माष्टमी व फूल बंगला उत्सव के समय यहाँ लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं।

    यात्रा की योजना

    दर्शन समय

    प्रातः 7:45 से दोपहर 12:00 और सायं 4:30 से रात्रि 9:30 तक (ऋतु के अनुसार समय में परिवर्तन होता है, दर्शन के बीच मंदिर बंद रहता है)।

    त्योहारों और विशेष अवसरों पर समय बदल जाता है। निकलने से पहले मंदिर के आधिकारिक स्रोत से पुष्टि कर लें।

    मथुरा जंक्शन से ऑटो व टैक्सी द्वारा वृंदावन लगभग 30 मिनट में पहुँचा जा सकता है; मंदिर परिसर तक अंतिम मार्ग केवल पैदल या साइकिल-रिक्शा से तय होता है क्योंकि गलियाँ संकरी हैं।

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    सामान्य प्रश्न

    मान्यता है कि बिहारी जी की चितवन इतनी प्रभावशाली और तीव्र मानी जाती है कि पुजारी दर्शनार्थियों की भलाई हेतु हर कुछ क्षणों में पर्दा गिरा देते हैं — यह मंदिर की एक विशिष्ट व अनूठी परंपरा है।

    परंपरा के अनुसार यहाँ बिहारी जी को विश्राम की स्थिति में माना जाता है, इसलिए मंदिर में घंटी या शंख बजाने की प्रथा नहीं है — यह अन्य अधिकांश कृष्ण मंदिरों से इसे अलग बनाता है।