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    शक्तिपीठ

    ज्वालामुखी शक्तिपीठ

    कांगड़ा जिला, हिमाचल प्रदेश

    जहाँ देवी की पूजा मूर्ति नहीं, प्राकृतिक ज्वाला के रूप में होती है

    एक नज़र में

    स्थान
    कांगड़ा जिला, हिमाचल प्रदेश
    आराध्य
    माता ज्वाला (जगत जननी)
    श्रेणी
    शक्तिपीठ
    परंपरा
    शाक्त
    निकटतम रेलवे स्टेशन
    ज्वालामुखी रोड (रणीताल) रेलवे स्टेशन; अच्छी कनेक्टिविटी हेतु कांगड़ा रेलवे स्टेशन (लगभग 2 किमी) या पठानकोट (लगभग 123 किमी, ब्रॉड गेज)
    निकटतम हवाई अड्डा
    गग्गल हवाई अड्डा, कांगड़ा (लगभग 45 किमी)
    घूमने का सर्वोत्तम समय
    मार्च से जून और सितंबर से नवंबर (नवरात्रि के दौरान विशेष मेला लगता है)।

    इतिहास

    ज्वालामुखी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कोई मूर्ति नहीं है — गर्भगृह में भूमि से नौ प्राकृतिक ज्वालाएँ निरंतर प्रज्वलित रहती हैं, जिन्हें देवी के नौ रूपों (नवदुर्गा) का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार यहाँ सती की जिह्वा गिरी थी। मुगल सम्राट अकबर ने भी इस ज्वाला की सत्यता परखने हेतु इसे बुझाने का प्रयास किया था, किंतु असफल रहने पर उन्होंने स्वयं यहाँ स्वर्ण छत्र अर्पित किया, जो आज भी मंदिर में मौजूद है।

    धार्मिक महत्व

    ज्वालामुखी को हिमाचल प्रदेश के सबसे प्राचीन व पूज्य मंदिरों में गिना जाता है और यह "ज्वाला जी" के नाम से पूरे उत्तर भारत में भक्तों के बीच लोकप्रिय है।

    यात्रा की योजना

    दर्शन समय

    प्रातः 5:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक।

    त्योहारों और विशेष अवसरों पर समय बदल जाता है। निकलने से पहले मंदिर के आधिकारिक स्रोत से पुष्टि कर लें।

    पठानकोट से नैरो-गेज पर्वतीय ट्रेन द्वारा कांगड़ा तक पहुँचकर, वहाँ से सड़क मार्ग द्वारा ज्वालामुखी पहुँचा जा सकता है। धर्मशाला व कांगड़ा से नियमित बस व टैक्सी सेवा भी उपलब्ध है।

    माँ दुर्गा की भक्ति आगे बढ़ाएँ

    इसी देवता से जुड़ी सामग्री, इसी साइट पर।

    सामान्य प्रश्न

    भूवैज्ञानिक दृष्टि से यह क्षेत्र प्राकृतिक भूमिगत गैस उत्सर्जन के लिए जाना जाता है, जिसे भक्त देवी की शाश्वत ज्वाला के रूप में पूजते हैं — यह विज्ञान व आस्था के दुर्लभ संगम का उदाहरण है।