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    शक्तिपीठ

    कामाख्या शक्तिपीठ

    नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी, असम

    सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ — जहाँ मूर्ति नहीं, स्वयं प्रकृति की पूजा होती है

    एक नज़र में

    स्थान
    नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी, असम
    आराध्य
    माता कामाख्या (आदि शक्ति)
    श्रेणी
    शक्तिपीठ
    परंपरा
    शाक्त
    निकटतम रेलवे स्टेशन
    कामाख्या रेलवे स्टेशन (लगभग 6-7 किमी); गुवाहाटी रेलवे स्टेशन (लगभग 8 किमी)
    निकटतम हवाई अड्डा
    लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, गुवाहाटी (लगभग 20 किमी)
    घूमने का सर्वोत्तम समय
    अक्टूबर से मार्च; अंबुबाची मेला (जून) एक अनूठा अनुभव है किंतु अत्यधिक भीड़ रहती है।

    इतिहास

    कामाख्या मंदिर 51 शक्तिपीठों में सर्वोच्च व सबसे पुराना माना जाता है। कथा के अनुसार जब शिव सती के शव को लेकर तांडव कर रहे थे, तब विष्णु के सुदर्शन चक्र से सती के अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे — यहाँ उनकी योनि (गर्भ) गिरी थी, जिससे यह स्थान स्त्री-शक्ति व सृजन का सर्वोच्च प्रतीक बन गया। मंदिर में कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं है; गर्भगृह में एक प्राकृतिक चट्टान-कुंड की पूजा होती है। वर्तमान मंदिर संरचना 16वीं शताब्दी में कूच बिहार के राजा नर नारायण द्वारा पुनर्निर्मित करवाई गई थी।

    धार्मिक महत्व

    कामाख्या तंत्र साधना का सबसे बड़ा केंद्र मानी जाती है, और यहाँ प्रतिवर्ष होने वाला अंबुबाची मेला (जून माह में) विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जो देवी के रजस्वला (मासिक धर्म) चक्र का उत्सव मनाता है — यह हिंदू परंपरा में स्त्री-शक्ति के प्राकृतिक चक्र को सम्मान देने वाला दुर्लभ उदाहरण है।

    यात्रा की योजना

    दर्शन समय

    प्रातः 5:30 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक (मध्याह्न में कुछ समय हेतु विशेष पूजा के लिए बंद रहता है)।

    त्योहारों और विशेष अवसरों पर समय बदल जाता है। निकलने से पहले मंदिर के आधिकारिक स्रोत से पुष्टि कर लें।

    कामाख्या रेलवे स्टेशन कोलकाता, दिल्ली, बेंगलुरु सहित कई शहरों से सीधे जुड़ा है। स्टेशन या हवाई अड्डे से नीलाचल पर्वत तक टैक्सी व ऑटो सुगमता से उपलब्ध हैं; पहाड़ी की चढ़ाई हेतु स्थानीय शेयर टैक्सियाँ भी चलती हैं।

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    सामान्य प्रश्न

    गर्भगृह में देवी की योनि-आकृति एक प्राकृतिक चट्टान-कुंड के रूप में पूजी जाती है, मूर्ति के रूप में नहीं — यह देवी की सृजन-शक्ति का सीधा, प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व माना जाता है।

    यह जून माह में मनाया जाने वाला वार्षिक उत्सव है जो देवी कामाख्या के रजस्वला चक्र का प्रतीक है; इस दौरान मंदिर तीन दिन बंद रहता है और फिर विशेष पूजन के साथ पुनः खुलता है।