
श्री गणेश जी की आरती
Shri Ganesh Aarti
श्री गणेश की सभी सामग्री देखें →जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ एकदन्त दयावन्त चार भुजा धारी। माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी॥ पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥ अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥ दीनन की लाज राखो शंभु सुतवारी। कामना को पूर्ण करो जग बलिहारी॥ सूर श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
अर्थ
यह आरती श्री गणेश की स्तुति है, जिन्हें पार्वती और महादेव के पुत्र तथा विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है। इसके पद उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं — एकदन्त, चार भुजाएँ, माथे पर सिंदूर और मूषक की सवारी — और यह स्मरण कराते हैं कि वे अंधों को दृष्टि, कोढ़ियों को निरोग काया, निर्धनों को धन और नि:संतानों को संतान प्रदान करते हैं। अंतिम पद में कवि "सूर श्याम" अपनी शरणागति निवेदित करते हैं। किसी भी शुभ कार्य, पूजा या नए आरंभ से पहले सबसे पहले गणेश जी की यही आरती गाई जाती है।
लाभ
- 🪷किसी भी नए कार्य, पूजा या गृह प्रवेश के आरंभ में गाई जाती है
- 🪷विघ्नों और बाधाओं के निवारण हेतु पारंपरिक रूप से गाई जाती है
- 🪷गणेश चतुर्थी और बुधवार की पूजा का प्रमुख अंग
- 🪷परिवार के साथ सामूहिक गान से घर में शुभ वातावरण बनता है
जप/पाठ विधि
गणेश जी की मूर्ति या चित्र के सामने घी या तेल का दीपक जलाएँ। दीपक को दाहिने हाथ से घड़ी की दिशा में गोलाकार घुमाते हुए आरती गाएँ। आरती के बाद दीपक की ज्योति पर हाथ फेरकर माथे से लगाएँ और लड्डू या मोदक का भोग अर्पित करें।
सर्वोत्तम समय
बुधवार तथा गणेश चतुर्थी विशेष शुभ हैं; अन्यथा प्रातः और संध्या की पूजा में किसी भी दिन गाई जा सकती है।