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    भगवान शिववैदिक मंत्र

    महामृत्युंजय मंत्र

    ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

    108 बार जप करें

    ऋग्वेद का वह मंत्र जो बीमारी और डर के समय याद आता है।

    प्रकार
    वैदिक मंत्र
    देवता
    भगवान शिव
    जप संख्या
    108 (एक माला)
    स्रोत
    ऋग्वेद ७.५९.१२

    अर्थ

    हम तीन नेत्रों वाले शिव की उपासना करते हैं, जो सुगंध से भरे हैं और सबका पोषण करते हैं। जैसे पकी हुई ककड़ी बेल से अपने आप अलग हो जाती है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से छुड़ाइए, अमरता से नहीं।

    परिचय

    यह मंत्र ऋग्वेद के सातवें मंडल में है, जो ऋषि वसिष्ठ से जुड़ा है, और यजुर्वेद में भी दोहराया गया है। ककड़ी वाली उपमा इसका सबसे सुंदर हिस्सा है। पकी ककड़ी को तोड़ना नहीं पड़ता, वह ख़ुद छूट जाती है। मंत्र यही माँगता है कि बंधन सहजता से छूटें। घर में कोई बीमार हो तो परिवार के लोग इसे मिलकर जपते हैं, और कई मंदिरों में सवा लाख जप का अनुष्ठान होता है।

    जप कैसे करें

    इस मंत्र में उच्चारण बहुत मायने रखता है, इसलिए हो सके तो किसी जानकार से एक बार सुन लें। शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल चढ़ाते हुए रुद्राक्ष की माला पर जप करें। शुरू में धीमे बोलें, गति अपने आप आ जाएगी।

    कब जपें: सुबह और प्रदोष काल। सोमवार और महाशिवरात्रि पर विशेष।

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    108 बार जप करें

    लोग अक्सर पूछते हैं

    परिवार इसे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की प्रार्थना के रूप में जपते हैं। यह इलाज की जगह नहीं ले सकता, इसलिए डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें।

    मा अमृतात्, यानी अमरता से नहीं। प्रार्थना मृत्यु से छूटने की है, अमृत से दूर होने की नहीं।

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