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    सार्वभौमिक / भक्तिवैदिक मंत्र

    गायत्री मंत्र

    ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

    108 बार जप करें

    ऋग्वेद का वह मंत्र जो सदियों से संध्या वंदन का केंद्र है।

    प्रकार
    वैदिक मंत्र
    देवता
    सार्वभौमिक / भक्ति
    जप संख्या
    108 (एक माला)
    स्रोत
    ऋग्वेद ३.६२.१०

    अर्थ

    हम उस दिव्य सविता देव के श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। शुरुआत में जो "भूर्भुवः स्वः" है, वे तीन व्याहृतियाँ हैं, यानी पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग, तीनों लोकों का स्मरण।

    परिचय

    यह मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल में है, जिसके ऋषि विश्वामित्र माने जाते हैं। यह सविता को, यानी सूर्य के उस रूप को जो सबको गति देता है, संबोधित है। गायत्री इसके छंद का नाम है, जिसमें चौबीस अक्षर होते हैं। परंपरा में यह संध्या वंदन का केंद्र है, जो सुबह, दोपहर और शाम किया जाता है। इसमें कुछ माँगा नहीं जाता, न धन, न स्वास्थ्य। बस इतना कि बुद्धि सही दिशा में जाए।

    जप कैसे करें

    सुबह पूर्व की ओर, शाम को पश्चिम की ओर मुँह करके बैठें। धीरे बोलें और हर पद के बाद हल्का ठहराव रखें: तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात्। उच्चारण के लिए किसी जानकार से एक बार ज़रूर सुनें।

    कब जपें: सूर्योदय, दोपहर और सूर्यास्त, जो संध्या के तीन समय हैं।

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    108 बार जप करें

    लोग अक्सर पूछते हैं

    यह सविता देव को, यानी सूर्य के प्रेरक रूप को संबोधित है। समय के साथ गायत्री को देवी रूप में भी पूजा जाने लगा।

    ऋग्वेद के मूल मंत्र में ये शब्द नहीं हैं। ये व्याहृतियाँ यजुर्वेद की परंपरा से आती हैं, और जप में ॐ के साथ मंत्र से पहले बोली जाती हैं।

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