अर्थ
ॐ को प्रणव कहते हैं। इसके तीन हिस्से हैं, अ, उ और म्। माण्डूक्य उपनिषद् इन्हें जागना, सपना देखना और गहरी नींद, इन तीन अवस्थाओं से जोड़ता है, और बोलने के बाद जो मौन बचता है, उसे चौथी अवस्था, तुरीय, कहता है।
परिचय
माण्डूक्य उपनिषद् में सिर्फ़ बारह मंत्र हैं, और पूरा उपनिषद् ॐ की ही व्याख्या है। वेद पाठ से पहले, पूजा के आरंभ में, योग कक्षा की शुरुआत में, हर जगह ॐ आता है। यह किसी एक देवता या संप्रदाय का नहीं है, और शायद इसीलिए इतनी दूर तक पहुँचा।
जप कैसे करें
सीधे बैठें, गहरी साँस लें, और छोड़ते हुए लंबा "ओ...म्" बोलें। अ, उ और म्, तीनों को अपनी जगह मिले, और म् पर होंठ बंद होने के बाद भी गूँज को चलने दें। फिर कुछ पल मौन में रुकें। वह मौन भी अभ्यास का हिस्सा है।
कब जपें: ब्रह्म मुहूर्त सबसे अच्छा। ध्यान की शुरुआत और अंत में भी।
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